सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर

कभी कभी मन में यह भाव क्यूँ आता है कि चलो हम कुछ दिन वह सब छोड़कर देखते हैं, वह सब जो हम निरंतर करते हैं अपने आसपास के लोगों के लिए। हम पहल करना रोकते हैं, हम संवाद रोकते हैं, हम हमेशा खड़े रहने की प्रवृत्ति को रोकते हैं, हाल चाल लेते रहने की आदत को रोकते हैं, रोकते हैं कि हमारे रोकने के बाद कौन हमसे पूछता है कौन पहले पहल करता है कौन उस समय पर आकर कहता है 'अरे आप नहीं आए तो हम चले आए'  क्यूँ आता है यह विचार ? जबकि यह तय है कि पलटकर कोई नहीं करने वाला पहल, सबकी अपनी व्यस्तता है, सबकी अपनी प्राथमिकता आप हँस कर कह देंगे तो जवाब भी आप पर ही लादकर दिया जाएगा। कारण क्या है इसका ? ऐसे सम्बन्धों का अर्थ क्या है ? सच में जानना यह चाहता हूँ ऐसे लोगों पर भावनाओं को ख़र्चने का क्या अर्थ ?  

जब दो जीवन के बीच वैसा चुम्बकत्व न हो जैसे होना चाहिए तो अपने जीवन को दूसरे जीवन से किनारे कर लेना ही उचित होता है। एकतरफा एफर्ट करता व्यक्ति हमेशा हृदयाघात से मरता है। यह सामान्यीकरण नहीं है, बस विचार है जिसे लक्षणा में समझने की जरूरत है। 

************

दिन ब दिन लिखे जा रहे साहित्यिक और दार्शनिक बातों का क्या अर्थ जब समाज को गंदे नाले की ही तरफ बढ़ना है, हम क्यूँ लगाएँ फूल जब उसे कोई देखने वाला ही नहीं। होने का महत्व तो तभी है न जब होने का कुछ सार्थक परिणाम निकले, नहीं तो होने और न होने में भेद क्या ? 

*********** 

हम जिस चीज़ से सबसे ज्यादा भागते हैं जो चाहते हैं यह नहीं करूँगा, यह नहीं लिखूंगा वही होता है, जिन दिनों में हम बस मजबूत और हँसमुख दिखते रहना चाहते हैं उन्हीं दिनों में उदासी सबसे ज्यादा घेरती है। तमाम इच्छाएँ उसी दौरान हमें जकड़ती हैं जब हम इच्छाओं से मुक्त होने की राह ख़ोज रहे होते हैं, इसका कारण क्या है पता नहीं ? 

अभी जो मैं इतना सब सोच रहा हूँ यह भी तो बेअर्थ ही है, सत्य इन सबसे बिल्कुल अलग है, मैं लिखने को लिख दो दूँ, मुझे किसी की याद नहीं आती, मैं नहीं ऊबता एक पल को भी, मैं नहीं होना चाहता हूँ कुछ भी, मैं रह लेता हूँ अकेले, दिलासा भी दे लेता हूँ अरे पिताजी तो चालीस सालों से रह रहें हैं अकेले, माँ भी उतने ही समझो पति के बिना और किसी उपस्थिति का कोई विशेष महत्व होता नहीं, तो तुम तो अभी कुछ नहीं हो , पर  फिर मन पूछता है ऐसे जीवन का मतलब क्या है ऐसे ही रहना है तो जीना ही क्यूँ है ? हम सब एक ही चीज़, जिसे साथ कह सकते हैं रहने के लिए अलग अलग क्यूँ रहते हैं? 

अब यह सब जो लिख गया है मैं नहीं सोच रहा हूँ, दरअसल कलम अपनी राह ख़ुद बनाती हुई यहाँ तक आयी है.. मैं तो वहीं हूँ..वहीं.. 

― आशुतोष प्रसिद्ध 
डायरी शाम 6:20 / 10 जनवरी 2025 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...