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मन के मन से

मन के मन से / मन के किसी कोने में पहले एक विचार पनपता है, उस विचार की जड़ पकड़े कोई दूसरा आता है, दूसरे को पकड़े तीसरा आता है, और फिर ये संख्या लगातार बढ़ती जाती है। कितना भी जतन करो फिर ये आगमन रुकता ही नहीं है, आने वालों को रोको,बताओ कि मैं ख़ाली नहीं अभी विचारों के लिए, फिर भी वो आते हैं।उनको लगता है हम जाकर उसे बनाएंगे, उनको कभी नहीं लगता हम जाकर उसे घटाएंगे भी...यह कैसे सम्भव है आना केवल बढ़ाए, घटाएगा भी..क्योंकि वो आने जीवन की ऊर्जा भी तो लेगा आपसे... इन दिनों विचारों से जूझते जूझते मैंने महसूस किया कि विचार का डीएनए और घुन का डीएनए एक जैसा होता है। पहले कोई एक आता है और कब वो एक अकेले एक हज़ार बना देता है पता नहीं चलता। पता भी तब चलता है जब बोरी खोलने पर गेहूँ नहीं धूल निकलती है। गेंहू और घुन का उदाहरण ऐसे नहीं आया। एक घटना है। वर्ष ठीक ठीक याद नहीं, हाँ ! इतना याद है की बाबा जिंदा थे। उस हिसाब से यही कोई 2006 या 2007 का समय रहा होगा। मैं 11 या 12 वर्ष का था,घर पर कोई धार्मिक आयोजन होना था तो हम सब भाई बाबा के आदेश पर एक रोज़ भूसे में घुसे उसके भीतर दबी गेहूँ की बोरियां निकालने।पर जैसे ...