लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है। बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं। आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ।...