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चक्कर ही चक्कर है दुनिया में

जीवन आवृत्ति के सिवा क्या है? हम जहाँ से ऊबकर थककर परेशान होकर भागते हैं फिर वहीं लौट आते हैं न चाहते हुए भी,  इस आवृत्ति में ही सब शामिल होता जाता है और हम भारी होते जाते हैं। हल्के हम मृत्यु से भी नहीं होते, मृत्यु हमें हल्कापन नहीं देती, आवृत्ति का बोझ उठाए चलते रहने से थकी देह को आराम देती है कि लो बैठ लो आगे फिर चलना है, इस आवृत्ति में मिला बोझ उठाकर ही..  अनन्त का जो चिन्ह है उसे कभी करीब से देखो तो कितना भयावह है वह, कोई ओर छोर ही नहीं..  कुछ शब्द बार बार मन में घूमते हैं, उन्हें लिख चुका हूँ, फिर उन्हें लिखना नहीं चाहता, अब उन्हें सोचना भी नहीं चाहता, फिर भी वो मेरा पीछा नहीं छोड़ते.. काश छोड़ देते !  कई सालों के कैलेंडर उठाकर देख लिया है, उसमें कोई ऐसी तारीख नहीं जिसमें मैं पूरा दिन सुख से जिया होउँ, चिंता, अपमान, ग्लानि, नाम की कोई रस्सी हर दिन मेरा गला कसती गई है। कसती गई है। धीरे धीरे मैं कसाव का आदी हो गया। अब मुझे कसाव और जकड़न में ही चलने की आदत है, स्वतंत्रता में चलने में बड़ा अजीब महसूस होता है।  जीवन के बीतते हर दिन के साथ मैं यह महसूस करता जा रहा ...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

सोच की दुनिया कितनी छोटी होती है

सुख असंगत दिनों में न जीने की इच्छा को जीने की इच्छा में बनाए रखने के लिए खोजा गया एक छली शब्द है। हम जीवन की लगभग क्रियाओं को दोहराते हैं, हम एक बार में कुछ नहीं कर पाते हैं, हम जन्म लेने के बाद एक बार फिर जन्म लेते हैं जब हमें पता चलता है कि मरना भी कुछ होता है, हम एक बार हँसने के बाद दुबारा हँसते है एक बार उस क्षण पर फिर उस क्षण में हँसी गयी हँसी पर हँसते हैं। हम दो बार रोते हैं एक बार उस बात पर जिससे रोना आता है दोबारा अपने रोने पर रोते हैं।रोने पर रोना सामान्य रूप में रोने से ज्यादा घातक है। हृदयविदारक है। हम प्यार भी दो बार करते हैं, एक बार तब हम उस भाव को शब्द देते हैं जो किसी को देखकर हमारे भीतर उपजा था दुबारा तब जब हम भूल जाते हैं कि हमने क्या शब्द दिया था। और इंतज़ार.. कई बार करते हैं इंतजार.. एक बात कही जाती है .. ' काहे खून जला रहे हो ' ऐसी ही एक बात और है 'क्यूँ माथा फोड़ रहे हो अपना' ये दोनों बातें हमेशा अपने लिए नहीं दूसरे के लिए समझ आतीं हैं। हम अपने मामले में महसूस ही नहीं पाते कि हम क्या कर क्या रहें हैं हम माथा फोड़ रहें हैं या खून जला रहें ह...