कभी डर से इस शहर से भागता हूँ, कभी फिर जीने का सहारा खोजते लौट आता हूँ। शहर जाम से पटा पड़ा है। आदमियों से ज्यादा गाड़ियां हैं। मुझे बन्द गाड़ियों में यात्रा करना बहुत खलता है। सिर फटने लगता है, उल्टियां होती हैं। हुआ भी वही सब.. लोग इतने अनियंत्रित और अव्यवस्थित हैं कि उन्हें देख देख कर मन में क्रोध भर जाता है। रास्ता आँख मुँह बन्द किए जैसे तैसे कटा, 9 किलोमीटर की पद यात्रा के बाद जैसे तैसे कमरे पर पहुँचा.. आज कमरे पर पहुँचने की जल्दी नहीं थी। बस था कि पहुँच जाऊँ, उस गन्ध के आसपास, उन चीज़ों के आसपास जहाँ से दूरी का आभास घटता है। फूल सूख गए हैं, इतने की छू दिया तो धूल की तरह बिखर गए, इन्हें उसके लिए लाया था, उसे सफेद फूल बहुत पसंद हैं, महीनों से उसे दे नहीं पाया, आज एक जगह देखा, मगर लेने का कोई अर्थ महसूस नहीं हुआ.. किसी दिन मैं फूलों की दुकान खरीदकर उसे दे दूँगा । मन तो आज ही था मगर दूँगा कैसे ? कह भी तो नहीं सकता.. नीचे आओ जरा.. गली में खड़ा हूँ ' शहर में इतनी भीड़ है, इतने लोग लेकिन एक अनुपस्थिति सबको अर्थहीन कर देती है, लग रहा है कोई नहीं है। कहाँ ही है कोई ...