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ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर

सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया,  निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है। सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।  एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।  मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।  किसने बनाया ये नियम की कह दी गई बात वापस नहीं होगी ? देख लिया गया सपना भुलाया नहीं जा सकेगा ...

बँटा हुआ है मेरा जीवन, बावन खण्डों में कटा हुआ

बिस्तर छोड़कर जब बाहर निकला तो चारों ओर गहरा धुन्ध छाया हुआ था, मन हुआ लौटकर फिर बिस्तर में ही पड़ा रहूँ। मगर चार नए जीवन की बालसुलभ शैतानी ने रोक लिया, तीन छोटे छोटे पिल्ले हैं उन्हें सुबह अधिक दुलार आता है, देखते ही आसपास पूँछ मटकाते हुए दौड़ते हैं, आगे के दोनों पाँव पटककर खेलते हैं, बिल्कुल छोटे टैडीबियर की तरह है गोल मटोल मुलायम से बिल्कुल, इनकी माँ ने इन्हें इस बार बहुत सम्भाल कर रखा था, दो महीने वो उस जगह से निकल नहीं पाए जहाँ उन्हें जन्म दिया था। अब वो निकलते हैं। टहलते हैं। मम्मी को देख लेते हैं तो जैसे खुशी से पागल हो जाते हैं उनके आसपास ऐसे उठते गिरते हैं की देखते बनता, उनकी साड़ी की कोर खींचते हैं, मनभर खेलते हैं, और एक हमारे हीरो हैं सोना के अकेले दीपक, बड़ी बड़ी आँख और कान लिए अपनी माँ का दूध पी लेने के बाद पूरे अहाते में ऐसे कुलांचे भरते हैं जैसे वो गाय के नहीं घोड़ी के बच्चे हों.. जानवरों के बच्चें हों आदमी के बच्चे हों या ख़ुद आदमी ही हों ये सुबह अधिक प्रेम से भरे होते हैं। इनकी स्फूर्ति नए ढंग से नए रंग रूप में दिखती है। मैं हर शाम जो होता हूँ, सुबह वह कभी नहीं होत...

प्रीति रहै इकतार

                  एक शब्द है 'होना' आपने इसे किस तरह जिया है ? आप किसी के लिए कितना वह हो पाए जो वह चाहता है ? क्या यह कहना अनुचित होगा कि यूँ ही होने से बेहतर होता है किसी के लिए होना, किसी का होना।  यह बिन सिर पैर की बात है क्योंकि इस बात का सिर और पैर तर्क से देखा नहीं जा सकता। यह भावनात्मक अनुभूति है जो यूँ ही छोटी बहन से संवाद करते हुए एक वाक्य के श्रवण मात्र से मेरे भीतर उपजी, भीतर जैसे कुछ कौंधा मैं देर तक सोचता रहा उस वाक्य को, देर तक सोचने के बाद  मुझे महसूस हुआ कि ऐसे वाक्य परिवार में ही बोले सुने जा सकते हैं। क्या कभी किसी ने आपसे बोला की वह आपको अकेले छोड़कर नहीं जाएगा ? नहीं बोला होगा ! मुझसे नहीं बोला किसी ने मैं हर जगह अकेला छूट जाता हूँ। घर परिवार में, रिश्ते में, दोस्तों में, अपने में भी.. क्यूँ ? पता नहीं। शायद मैं सबके साथ होने का प्रयास करता रहता हूँ इसीलिए।  'प्रीति रहै इकतार' इसे फिर पढ़िए, पढ़ा ? अब बताइए कुछ समझ आया ? नहीं आया तो फिर पढ़िए, हर चीज व्याख्यायित नहीं की जा सकती है। यह कबीर के एक दोहे के द्व...