गर्भ जब मां के पेट से बाहर इस दुनिया की तरफ बढ़ता है तो सबसे ज्यादा और सबसे पहले उसे जो शब्द सुनाई पड़ते हैं वह जीवन भर उन्हीं शब्दों का अनुकरण करता रहता है.... हम सब खुद को थोड़ा सा और जोर लगाते, धकियाते बढ़ते रहते हैं उम्रभर। न जाने बढ़ते रहते हैं या घटते रहते हैं। यह भी अजीब प्रश्न है, मगर यह तो प्रश्न। इस प्रश्न के प्रतिउत्तर में जितने भी तर्क हैं, सब कुतर्क हैं। *********** मन को मन जैसा महसूस करने के लिए मन का कुछ कुछ होते रहना जरूरी है। बिना बारिश के धरती भी पानी देना बंद कर देती है। ************ सुबह आंख खुलते से धूल और गंदगी से लिपटा रहा, फिर भी सब साफ़ नहीं हुआ, सब कुछ है ही इतना गंदा की जिससे साफ करना चाहते हैं वही गन्दा हो जाता है। फिर साफ से गन्दा हुए को साफ करना पड़ता है। और फिर वही.. जबसे गाड़ी ली है पहली बार वह इतने दिन बन्द खड़ी थी, धूल और गंदगी से सनी हुई, अपने को धुलने से पहले उसे धुला, फिर स्टार्ट करते रहा न स्टार्ट हुई, शायद नाराज़ हो गई थी कि मैं तो तुम्हारे लिए हर कदम खड़ी रही, फटे टायर भी घसीटा तो चली, तुम मुझे छोड़कर चले गए, माफ़ी माँगा, साफ सफा...