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अनुस्यूत

आह और कराह के स्वरों में ध्वनि नहीं होती है। ये बिना ध्वनि के एक अदृश्य तरंग की तरह कम्पित करते चलते हैं। यह जहाँ टकराते हैं गहरा घाव करते हैं, गहरा इस अर्थ में कि इनका कोई रूप तो होता नहीं कि कहा जा सके फलाँ व्यक्ति की आह से इतनी चोट लगी, या उसकी कराह की तीव्रता इतनी थी कि मेरा दिल फलाँ इंच या फलाँ सेंटीमीटर पसीज गया।  हमारी संवेदना व्यक्ति बद्ध होती है। उसे चोट बीमारी या कोई तकलीफ से फ़र्क तभी पड़ता है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति को हो जिसकी वजह से हमारी दिनचर्या प्रभावित होती है।  ********* न जाने किसने कहाँ कहा है कि ' जो हमारे बिना रह सकते हैं, उन्हें हमारे बिना ही रहना चाहिए ' ये वाक्य बीते महीने में मुझे लगातार रह रह कर याद आता रहा।  ******** हम सबसे सच्चे प्रेम में होते हैं, और झूठ भी प्रेम में ही प्रेम के लिए बोलते हैं। मैंने बहुत झूठ बोले हैं। मुझे उसपर कोई पछतावा नहीं होता, मौका मिला तो भविष्य में और बोलूँगा बोलता रहूँगा। मगर अपने प्रिय से नहीं, प्रिय के साथ रहने के लिए और तमाम दुनिया से... झूठी दुनिया से झूठ बोलने के क्या ही दिक्कत है।  ********** अगर आप यह देखन...

तुम अपने चरणों में रख लो मुझको

निर्वासन सा महसूस होता रहता है। कहाँ से ? यह पता नहीं। मगर लगता है कहीं हूँ ही नहीं। जिस परिवार के लिए जूझता रहा, अपने को खपा दिया, वहीं मुझसे कोई बातचीत ही नहीं है। सूचनाएं दुसरो से मिलती हैं। लगभग रोज फोन करूँ तो बात हो न करूं तो पलट के कोई पूछता तक नहीं। मैं देर तक निहारता रहता हूँ राह, कोई पुकारे , कोई कभी तो कहे कि .... ख़ैर.. यह स्वीकार करना कितना कष्टकारी है कि धीरे धीरे अपने भाई बहन भी पड़ोसी बन जाते हैं। अनन्तः आपका कौन है आपकी माँ और बीबी के सिवा.. ? वो भी एक दिन नहीं पूछें तो कोई अचरज नहीं होगा।   मेरे भीतर कल्पनाओं का एक संसार है, जहाँ मैं अपनी रचनात्मक उठापटक के साथ रहता हूँ। मुझमें घनघोर कामना है। वासना नहीं है। है भी तो वह उसी की है जिसके लिए होनी चाहिए। मैं घण्टों चुप रहता हूँ, कम बोलता हूं , बाहर लोगों से इंटरैक्ट नहीं हो पाता इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मैं आ अकेले रहना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि कोई है को महसूता रहूँ और रहूँ। मैं रहने की तरह रहना चाहता हूँ। अतिक्रमण की तरह नहीं। मैं जीने की तरह जीना चाहता हूँ मरते रहने की तरह नहीं।  *  ...

स्मृति

दिन !  एक के बाद अनेक दिन बीतते जाते हैं और हम सिकुड़ते जाते हैं। हम एक दिन इतना सिकुड़ जाते हैं कि थोड़ा और सिकुड़ने की इच्छा से टूट जाते हैं। हम आप टूटते हैं। आप ही जुड़ते हैं।  जब हम एक याद सहेजते हैं तो कई कई और यादों को भी एक साथ सहेज रहे होते हैं। उन्हीं कई कई यादों में से हम किसी एक याद के बने होते हैं। हमारी काया अनगिन यादों की कर्जदार है।  लिखा हुआ कुछ कितना अलौकिक होता है कितना सच्चा। कुछ शब्द छू रहा था और रो रहा था। कई बार वह बताया नहीं जा सकता जो महसूस होता है। ऐसा ही कुछ .. आज मन स्मृतियों में ही टहलता रहा।  गौरी और कृधा के साथ खेला कुछ देर..दोपहर बाद से स्मृतियों से दो दो हाथ कर रहा हूँ।  हिम्मत नहीं है कुछ अब । आज इतना ही। सब ठीक है।  मैं समझ नहीं पाता कभी कभी रो लेने के बाद जितना खालीपन और शांति लगती है, कभी कभी उससे उलट मन भारी हो जाता है। क्यूँ ..?  ― 21 मार्च 2025 / 8: 20 शाम 

चले जाने का चले जाना

'वो मिलकर चले गए' इस वाक्य में मिलने पर जोर दूँ या चले गए पर ? चले जाने से क्यूँ चला जाता है मिलने का सुख ? कौन छूटता है दो लोगों के मिलने पर और चले जाने पर ? मिलने आने वाला या मिलकर चले जाने वाला ? जो भी छूटता है वह कैसे रहता है अकेले ? मेरी तरह तो नहीं रहता, हर शय में उसे ही तलाशता हुआ। वही जो चला गया। जिसका जाना आने से पहले तय रहता है। जिसपर मेरा पूरा अधिकार है और कोई अधिकार नहीं। जिसे छू सकने का सामर्थ्य मुझमें आजतक नहीं, वो मुझे छुए इतना भाग्यशाली तो मैं हूँ नहीं। हम अधूरी इच्छा ही नहीं अधूरी छुवन से भी भरे हुए हैं। हम पर इतना दबाब है कि हम जब जब फटते हैं रो पड़ते हैं। हमारे ज्वालामुखी का केंद्र आँख है और लावा वह आसूँ जो उससे फूट पड़ता है। यह बेहद गर्म होते हैं। यह दुःख के आँसू होते हैं। दुःख के आँसू गर्म होते हैं। ग्लानि के ठण्डे।  इतने सालों में मैंने एक बात गौर की जब जब मुझे रोना आता है मेरी बाईं आँख से आसूँ पहले गिरता है दायीं आँख से बाद में। ऐसा क्यूँ पता नहीं । मगर ऐसा है। मेरे भीतर की स्त्री दाहिने क्यूँ नहीं होती। अब स्त्रियों को अपनी जगह बदल लेनी चाहिए व...

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं

दो बहुत सख़्त चीजें नहीं जुड़ती हैं। बहुत सख़्त को जोड़ने के लिए बहुत नरम करना पड़ता है। इतना नरम की लगभग पिघलने की अवस्था तक पहुँच जाए। पिघलने की अवस्था तक ही पहुँचे, बहने तक नहीं। फिर उन दोनों पिघली हुई चीजों को एक साथ अपनी तमाम चीजों को छोड़कर एक दूसरे में मिलना होता है, मिल जाने के बाद फिर धीरे धीरे अपनी नरमाहट को कठोरता में परिवर्तित करना होता है। क्योंकि लगातार पिघलने की अवस्था में रहने पर पिघलना, बहने में बदल जाता है। रिश्ते भी ऐसे ही जुड़ते हैं। हम बहुत नरम होकर जुड़ते हैं फिर जुड़ जाने के बाद जब अपनी और अपनी अवस्था के साथ साम्य नहीं बनाते तो टूट जाते हैं। जैसे जैसे समय बीतता है, स्वभाव भी बदलता है। यह स्वाभाविक है। इसे हँसकर स्वीकार करना होता है। अन्यथा फिर रिश्ते टूट जाते हैं। तोड़ने के लिए नरम नहीं करना पड़ता।  दो लोगों के बीच अपनी अलग किस्म की केमेस्ट्री होती है। वह किसी दूसरे दो लोगों की तरह नहीं हो सकती, वहाँ तुलना दो लोगों में भेद पैदा करता है। साथी बनने के लिए अपने मन से ज्यादा अपने साथी के मन से चलना होता है। उसके मन से चलकर ही रिश्ता सुंदर होता है। जरूरी बात है क...

कोउ लांघत कोउ उतरत थाहै

भले ही शब्द ब्रह्म हों लेकिन मैं अपनी अनुभूति को ठीक ठीक उनके सहारे भी नहीं कह पता। कई कई पन्नों में मन लिखता हूँ, फिर भी लगता रहता है कह नहीं पाया। और अजीब यह है कि उसके दो लाइन के जवाब में भी लग जाता है सब मन का हो गया।  *********** कुछ करते हुए या किसी से बात करते हुए अचानक किसी का ख़्याल एक बार को आ जाए तो उसे कहते हैं 'याद आई थी आपकी' पर जब कोई लगातार मन में बना रहे, हर साँस के आरोह अवरोह के साथ बाहर भीतर हो तो उससे कैसे कहें कि याद आ रही है...? ************* कल रात पता नहीं क्यूँ नींद ही नहीं आ रही थी, बड़ी मुश्किल से आखिरी पहर में आँख लगी। सुंदर सपना देखा। मन ख़ुश हो गया। आँख खुलते ही भाग गया सब्जी मंडी, वहां से लौटा तो चाय नसीब हुई, कल मंगलवार का व्रत था तो आज बिना नहाए कैसे पी सकते थे पानी। माता गयीं नाना के घर, आज घर पर मैं अकेले हूँ। शाम को ऊब रहा था तो आज घर के उस उस कमरे और कोने तक गया जहाँ जल्दी कभी जाना ही नहीं होता। दलान में रहते रहते भूल गया था कि घर में और भी कई कमरे हैं। हम अपने ही घर में रहते हुए नहीं रहते। घर के सभी कोनों को नहीं जानते। जैसे हम अपने करीबियों क...