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अनुस्यूत

आह और कराह के स्वरों में ध्वनि नहीं होती है। ये बिना ध्वनि के एक अदृश्य तरंग की तरह कम्पित करते चलते हैं। यह जहाँ टकराते हैं गहरा घाव करते हैं, गहरा इस अर्थ में कि इनका कोई रूप तो होता नहीं कि कहा जा सके फलाँ व्यक्ति की आह से इतनी चोट लगी, या उसकी कराह की तीव्रता इतनी थी कि मेरा दिल फलाँ इंच या फलाँ सेंटीमीटर पसीज गया। 

हमारी संवेदना व्यक्ति बद्ध होती है। उसे चोट बीमारी या कोई तकलीफ से फ़र्क तभी पड़ता है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति को हो जिसकी वजह से हमारी दिनचर्या प्रभावित होती है। 

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न जाने किसने कहाँ कहा है कि ' जो हमारे बिना रह सकते हैं, उन्हें हमारे बिना ही रहना चाहिए ' ये वाक्य बीते महीने में मुझे लगातार रह रह कर याद आता रहा। 

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हम सबसे सच्चे प्रेम में होते हैं, और झूठ भी प्रेम में ही प्रेम के लिए बोलते हैं। मैंने बहुत झूठ बोले हैं। मुझे उसपर कोई पछतावा नहीं होता, मौका मिला तो भविष्य में और बोलूँगा बोलता रहूँगा। मगर अपने प्रिय से नहीं, प्रिय के साथ रहने के लिए और तमाम दुनिया से... झूठी दुनिया से झूठ बोलने के क्या ही दिक्कत है। 


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अगर आप यह देखना चाहते हैं कि किसे आपकी परवाह है तो एक दिन अपनी नियमित की आदत छोड़ दीजिए। सारे सम्बन्धों की सच्चाई खुल जाती है। 


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दुनिया और सम्बंध सब लगभग औपचारिकता पर चल रहे हैं। 

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एक अजनबी भार हमेशा बना रहता है। किसी अनहोनी की आहट हो रही है। कल शाम से मन अजीब हुआ है। जैसे भरी भूख में थाली छीन ले कोई ऐसे। आज दिनभर बिस्तर पर रहा। थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा। शाम कुछ देर बाहर निकला था। रोहित और आशुतोष से मिला। उनकी बातों पर हँसा। हम कभी कभी वहाँ से बहुत कुछ सीख लेते हैं जहाँ से उम्मीद नहीं होती.. 

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प्रियंका दीदी से बात हो रही थी, वो मखा गईं थी।दोनों भाई बहन साथ मन भर रोए। मम्मी पापा सब ठीक हैं। पिताजी का पाँव जल गया था। अब ठीक है। कह देता हूँ कुछ न किया कीजिए तो कहते हैं.. 'का करी घरे बैईठ जाई अबहीं से ' मैं कैसे कहूँ मेरा मन तो यही है। जो जहाँ हैं पिस रहें हैं। साल भर पढ़ाने के बाद बच्ची आईं हैं तो दिनभर काम करती रहती हैं। पापा अलग परेशान हैं, वो अलग.. मैं बहुत करके भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। काश ! जैसे ख़ून चढ़ाया जाता है वैसे किस्मत बदल ली जाती तो मैं सारे कष्ट अपनीदेह में उतार लेता। 

मैं घण्टों चुप रहना चाहता हूँ। बाहर भीतर दोनों तरफ से। 

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तुम्हारा पाँव याद आ रहा था.. बहुत.. मैं उन्हें चूमना चाहता हूँ। 

― 29 मई 2025 / 10 : 15 शाम 

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