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बुद्ध विषयक

बुद्ध को सच ही लाइट ऑफ एशिया कहा गया है। वह उन सभी काम की कुछ बेकाम की चीजों को जलाकर अकेले खड़े हुए थे जो नष्ट होने की कगार पर थे।  बुद्ध राख को भस्म नहीं, भस्म को राख कहने वाले थे।  गौर से देखा जाए तो उनका पथ कहीं से इतना नया नहीं था कि समझ से परे हो, उनके जन्म के समय के चमत्कार और भविष्यवाणी बिल्कुल वैसे ही है जैसे अन्य गढ़े और स्वीकारे गए देव पुरुषों के हैं।  बुद्ध इस भीषण संसार में ऐसा कोना हैं जो आपको भागने की जगह देते हैं और अपने भागने को उचित ठहराकर लौट आने का भी। बुद्ध छली हैं और डरे हुए भी। वो जिससे जन्में उम्र भर उसी से भागते रहे। उनकी तमाम शिक्षाएं भागने के बेहतर और लोक स्वीकार के तरीके हैं।  बुद्ध भारतीय संस्कृति में चारो ओर जड़ बना चुके बूढ़े पेड़ों के बीच खड़े अकेले बेल क्राफ्टेड पेड़ थे। उन्होंने पुराने पेड़ की शाखा काट दी जड़ वही रखी, एक पुरानी जड़ में उन्होंने एक नए पौधे की कलम दी और वह चल निकला। बुद्ध मरघट की जीवटता वाले हैं। बुद्ध हैं क्योंकि हम जन्मना बुद्धु हैं।  बुध्द हमारी बन्द आँख की दोनों पलकों को अपने हाथ की उंगलियों से जबरन फैलाकर क...

शब्दों में कैसे रोया जा सकता है ?

हम सब अपनी अपनी ज़मीन पर लड़ रहें हैं। हमारे संघर्ष हमारे अलावा कोई नहीं देखता। देखना भी नहीं चाहिए अन्यथा हम एक दूसरे से प्रेमभाव कम दयाभाव अधिक रखेंगे। दया और प्रेम में अंतर है बहुत बड़ा अंतर ।  ********** सबसे गहरी रुलाई हम बिना आसूँ बहाए रोते हैं।  *********** इतने आदमी हैं फिर भी हर आदमी अकेला है। क्यूँ ?  *********** नींद न आने की भी एक सीमा होती है, हम अपनी मन की जगह पाते ही छोटे बच्चों की तरह सोते हैं। फिर वो नींद कुछ पल की ही क्यूँ न हो पूरी लगती है।  *********** इन दिनों अश्वघोष को पढ़ रहा हूँ, बुद्ध को समझ रहा हूँ, और बार बार महसूस रहा हूँ कि परिवारिक जीवन जीना है तो साधू संतों से दूर रहना चाहिए, और साधू संतों के पास रहना है तो परिवारिक जीवन से.. दोनों एक साथ सम्भव नही। दोनों साधने में हम कई जिंदगी बर्बाद करते हैं।  ***********  जीवन जीना पग पग पर समझौता करना है, अपने प्रिय व्यक्ति से दूर रहना है। ऐसे जीवन मुझे नहीं जीना। मैं अब मर जाना चाहता हूँ... काश! यह डायरी का आख़िरी पन्ना होता। तो मैं इसमें लिखता मैं बहुत खुश हूँ। इतना ख़ुश की नहीं चाहता की...