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इन दिनों की बात

भावना उस नदी का नाम है जिस पर बाँध सम्भव नहीं हो पाया है, जहाँ जबरन प्रयास हुआ भी वहाँ कुछ अच्छा नहीं हुआ। पानी को देर तक किसी पात्र में रखने पर वह सड़ जाता है, मगर अपनी सड़न के साथ भी बह निकलता है, दिन, महीना, साल लग सकता है मगर वह निकलता जरूर है। भावना पानी ही है, वो भावना सबसे सुंदर है जो लगातार अपनी गति के साथ बह रहा है, जब भावना दबाई जाती है तो वह कभी भी सकारात्मक रूप में दुबारा नहीं फूटती, नकारात्मक ही फूटती है। इस बात के कई जीते जागते उदाहरण इस देश की आबोहवा में मौजूद हैं जो समय समय रिसने लगते हैं फिर उनपर टांका लगाकर रोका जाता है, हर बार का दबाब उसे और घातक ही करता जा रहा है। यह एक दिन अपने विनाशकारी रूप में फूटेगा.. तब कुछ काम नहीं आएगा।  ************ क्या है कहना इस जमीन के साथ धोखेबाज़ी होगी कि मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता ?  ************* जब भी हम कहीं एक जगह होते हैं तो कई और जगहों पर नहीं हो पाते, दरअसल नहीं होना ही ईमानदारी है, लेकिन यही ईमानदारी कहीं अमानुषिकता है, कहीं छल, कहीं कुछ और..  फिर करें क्या ? क्या कहीं न होकर नहीं रहा जा सकता ? अजीब है! ल...