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जाने किस चीज की कमी है अभी

लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है।  बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं।  आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ।...

ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर

सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया,  निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है। सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।  एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।  मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।  किसने बनाया ये नियम की कह दी गई बात वापस नहीं होगी ? देख लिया गया सपना भुलाया नहीं जा सकेगा ...

'अन' उपसर्ग की तरह है सब

जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है। हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं।  बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ।  जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं।  बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर ज...

जिनमें आवाज़ नहीं है

◆ जिनमें आवाज नहीं है उस दिन मैं देर तक सोचता रहा था। आपने गहरे तक प्रभावित किया। इनकी बात से फलां चीज़ को फलां दृष्टिकोण मिला। हम देखते हैं। मेरा भी मन था पर नहीं कर पाया / पायी ।  समय नहीं मिल पाया। समय कम था। जलन। वो उन लोगों के आसपास रहता है वैसा है नहीं। पता नहीं क्या हो गया है। मित्रों। भाइयों बहनों। दोस्त। आपके अलावा कोई नहीं। देशभक्ति। साधु। महाराज।  मुझसे नहीं हो पा रहा है। अन्तोगत्वा। अन्ततः। ऐसे और कुछ शब्द युग्म जिनसे मैं अब भली भांति परिचित हो चुका हूं अब मैं इनके जाल में नहीं फँसता, जहाँ भी यह उपयोग किए जाते हैं मैं समझ जाता हूँ यहां कुछ तो दिक्कत है। विशेषण, अपवाद, और अति शांत तीनों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।  ***********  गुटों, प्रोफेसरों, नेताओं, अफसरों, विभागों, किताबों,  जातियों, धर्मों, के बीच मनुष्य मर गया, हम सब जिसे देख रहें हैं, हाथ मिला रहें हैं, मुस्कुरा रहें हैं, सब किसी न किसी गुट के हैं, किसी न किसी जाति के हैं, किसी न किसी धर्म के हैं, स्वतंत्र कोई नहीं हैं, शोषकों का विरोध करते करते यह सब खुद शोषक बन गए हैं। इन सब से उ...

जलं नदीनां च नृणां च यौवनम्

संस्कृत कवियों ने नायक को चार प्रकार का बताया है। इन चारों प्रकारों में जो पहला प्रकार है जिसे धीरोदात्त नायक कहते हैं उसके अंतर्गत राम आते हैं, दुष्यंत आते हैं, भीष्म आते हैं। यह वो लोग थे जिन्होंने अपने कहे के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। मगर सोचने की बात है आज जब लोग अपनी कही बात को घण्टे भर में पलट दे रहें हैं जब इतने साधन हैं इतनी सुविधा है, जब इतने विचारवान लोग हैं जो बाजारवाद के विरुद्ध लंबे लेख लिखते हैं और फिर उन्हीं लेखों को इकट्ठा करके छापकर बाजार में पुस्तक मेला लगाकर बेचते हैं तो उस समय का सोचकर देखिए जब कल्पित इतिहासकारों के अनुसार जब  भारतीयों के पास कोई ज्ञान नहीं था वो निरे मूर्ख और जंगली थे, खाल ओढ़कर जीते थे कबीले में रहते थे उनके  समाजिक संरचना भी नहीं थी। वह मनुष्य कहलाने लायक मनुष्य तो आक्रमणकारियों के साथ रहने से हुए, सभ्य जो अंग्रेजों से हुए उन असभ्य अमानुषिक लोगों का सोचिए जो अपनी कही बात के लिए मर मिटते थे। और आज के अनगिन और स्वघोषित नायकों का सोचिए जिन्हें इस समय के कवियों ने गढ़ा उनमें कितना अंतर है।  दरअसल मुझे यह सब याद इसलिए आ रहा है क्योंक...