वह सब कुछ जो कह देना चाहिए था मैंने छिपा लिया। स्मृति का नमक लादे चढ़ता रहा इच्छाओं के पहाड़ पर, नमक नहीं गला अब नमक नहीं गलते मैं गलता गया पहाड़ की तलहटी में ही त्याग दिया अपनी देह जो अभी कुछ क्षण पहले तक किसी की होने के लिए तड़प रही थी अब बह रही है पानी की तरह आगे यही गंगा में मिल जाएगी मगर गंगा न हो पाएगी ! ************ तो क्या ज़िंदगी इतनी ही आसान है ? जितनी आसानी से आपने अभी इन कविता नुमा पंक्तियों को पढ़कर ख़त्म किया। नहीं है, न कभी आसान होगी। यह स्मृतियों का नमक इतना कठोर है कि वह कई कई जन्म गलाएगा मेरी देह, मेरी इच्छा, फिर भी खुद न गलेगा। क्या यही कारण है कि नमक गलने से ज्यादा गलाने के काम आता है ? यही होगा ही। ************* तो फिर क्या बताऊँ की कैसा बीता दिन, बीता नहीं, मैंने किसी भारी पत्थर की तरह धकेल कर, चेहरे की नसें तन जाने तक जोर लगाकर जैसे तैसे खिसकाया यह दिन... मैं हर बार अपनी ही इच्छा के बोझ तले दब जाता हूँ, कल्पनाओं का महल खड़ा करता हूँ जिसे वास्तविकता सहजता से हल्के झोंके से ढहा क...