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ज्यादा सोचते कम विचारते हुए

अंधेरा ही अंधेरा दिखता है। किसी पेशाबघर में खड़ा होकर लड़ रहा हूँ अपने आसपास निवृत्त होकर जाने वाले हर उस आदमी से जो फल्स नहीं दबा रहा है। आज शायद चौथा दिन है। और जाने कौन से नम्बर का सपना है यह जो अभी अभी आपने पढ़ा। इससे पहले मैं अलग अलग सपनों में भी हकारता हुआ चिल्ला ही रहा था किसी को, कहीं गहरी अंधेरी गुफा में फसा हुआ हूँ और आगे निकलने का जतन कर रहा हूँ कुछ जानवर भी मेरे साथ फसे हैं, उनमें एक छोटा पिल्ला है, जो मेरे बचपन में घर पर था, तब मैं 6 वर्ष का रहा होउँगा, अंशुमान भईया उसे साइकिल पर पीछे बिठाकर ले जा रहे थे बाग की तरफ से और उसका पाँव चक्के में फंसकर टूट गया था, बड़े पापा ने उसको प्लास्टर करके बांस की फट्टी से जोड़ दिया था। वो फिर चलने दौड़ने लगा था। बहुत सुंदर था वो। वो उसकी टूटे पैर के साथ मेरे पास खड़ा है मेरा पैंट खींच रहा है और कुं कूँ कर रहा है, मैं इरिटेट होकर चिल्ला रहा हूँ जैसे सब मनुष्य हैं जो मेरी बात समझ लेंगे। शायद इसे ही बुखार सिर पर चढ़ना कहते होंगे। तो क्या श्रीकांत वर्मा को भी बुखार सिर पर चढ़ गया था ? ऐसी कविता पागलपन में ही लिखी जा सकती है।  दो दिन तो...