एक शब्द है 'होना' आपने इसे किस तरह जिया है ? आप किसी के लिए कितना वह हो पाए जो वह चाहता है ? क्या यह कहना अनुचित होगा कि यूँ ही होने से बेहतर होता है किसी के लिए होना, किसी का होना। यह बिन सिर पैर की बात है क्योंकि इस बात का सिर और पैर तर्क से देखा नहीं जा सकता। यह भावनात्मक अनुभूति है जो यूँ ही छोटी बहन से संवाद करते हुए एक वाक्य के श्रवण मात्र से मेरे भीतर उपजी, भीतर जैसे कुछ कौंधा मैं देर तक सोचता रहा उस वाक्य को, देर तक सोचने के बाद मुझे महसूस हुआ कि ऐसे वाक्य परिवार में ही बोले सुने जा सकते हैं। क्या कभी किसी ने आपसे बोला की वह आपको अकेले छोड़कर नहीं जाएगा ? नहीं बोला होगा ! मुझसे नहीं बोला किसी ने मैं हर जगह अकेला छूट जाता हूँ। घर परिवार में, रिश्ते में, दोस्तों में, अपने में भी.. क्यूँ ? पता नहीं। शायद मैं सबके साथ होने का प्रयास करता रहता हूँ इसीलिए। 'प्रीति रहै इकतार' इसे फिर पढ़िए, पढ़ा ? अब बताइए कुछ समझ आया ? नहीं आया तो फिर पढ़िए, हर चीज व्याख्यायित नहीं की जा सकती है। यह कबीर के एक दोहे के द्व...