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जैसे आँसू की यमुना पर छोटा-सा खद्योत

तुमसे बात करने की तीव्र इच्छा है। ऐसा लग रहा है रह रह कर कोई काँटा चुभो रहा है भीतर। पर बात क्या करूँगा पता नहीं। तुम्हारे सवाल का जवाब दे पाउँगा यह भी नहीं पता। मैं तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूँ। वही जिसमें शांति है। स्थिरता है। कुछ करते रहने का भार है। किसी मजबूरी का बोझ है। कौन सी पता नहीं। मैं जब जब तुमसे बात करता हूँ लगता है तुम कहीं दबी सी बोल रही हो। तुम्हें क्या कौन सा डर खाए जा रहा है पता नहीं। मैं जब तुम्हारे करीब भी होता हूँ और तुमसे वैसा व्यवहार नहीं पाता जैसा चाहता हूँ तो मेरे भीतर वह व्यवहार न पाने का शोक नहीं होता, ऐसा क्यूँ नहीं है ? किस बात की कचोट कौन सा अनुभव छीन ले गया तुमसे ऐसा व्यवहार इसकी चिंता खाए जाती है। तुम पूछती हो क्या सोचते रहते हैं हमेशा ? यही। कैसे बताऊं इसे कि यह डर बना रहता है। मैं भीतर बन रही चोट से ज्यादा तुम्हारे भीतर बने घाव की पीड़ा से व्यथित हुआ रहता हूँ। मैं जानता हूँ हर दर्द, हर नकार, हर संकोच का एक अतीत होता है। और हर अतीत की अपनी पृष्ठभूमि उसे मिटाई नहीं जा सकती। उस पर और रंग तो चढ़ाए जा सकते हैं न ? जिससे वह दिखे न..  सुबह से न जाने क्या क...