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समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...

उस तरफ जाने से पहले

हम भरे होते हैं कि अभी फलाँ व्यक्ति सामने पड़े तो बताऊं।  ढ़ेरों तर्क़ लगभग उतने ही सवाल जवाब लिए भीतर से बिल्कुल तने खड़े रहते हैं कि बस अबकी सब कह देंगे। अचानक उस चेहरे को देखते हैं जिसपर सिवा पसीजने के और कुछ किया ही नहीं जा सकता। हम बिल्कुल चौंक जाते हैं। हमें नहीं समझ आता यहाँ क्या करना है, कैसे पेश आना है। यह कितना अजीब है न कि हम दूर से कहीं की परिस्थितियों को बस सोच सकते हैं। किसी के मन को मनगढ़ंत सोच सकते हैं। सामने सब बिल्कुल अलग होता है। वास्तविकता से टकराते ही हमारे ख़्वाब के घर नींव सहित उखड़ जाते हैं। और हम असहाय हो खड़े हो जाते हैं। आम आदमी का हाल कुरुक्षेत्र में खड़े उस द्रोण की तरह है जो युधिष्ठिर के मुँह से 'नरो या कुंजरो' सुनकर अपना सब कहा सुना भूलकर हताश हो गया था। हम सब द्रोण ही हैं, हम सब एक अश्वत्थामा पाल रहें हैं।  ********** लगभग बातों पर मैं लगभग बचता रहता हूँ। जहाँ बहुत कुछ कहने की जरूरत होती है वहाँ कुछ कुछ कहकर बच लेता हूँ। रिश्तों को बचाए रखने के लिए कुछ घावों को रिसते रहने देना होता है और कुछ पर बकायदा मलहम पट्टी कर उसे ठीक कर देना होता है, यह...

जीवन राह

हम सब उम्मीद से ज्यादा किसी टीस के सहारे ज़िंदा हैं। टीस शायद ठीक शब्द होगा, अगर हम इसे खीझ कहें तो कोई ग़लत नहीं होगा। हॉं खीझ..खीझ ही हमें बचाए हुए है। समय से कुछ न हो पाने की खीझ, किसी से दूर रहने की खीझ, मन का जीवन न जी पाने की खीझ में हम जीवन को रगड़ा देकर जी रहें हैं। हम जीवन में जो कुछ तनिक  या हल्के मार्जिन से चूक गए उसके लिए जीवन से भारी शुल्क उसूल रहें हैं। हमारी जीवन शैली ऐसी है कि जीवन भी अब जीवन रूप में आने से डरने लगा है।  कल की रात नींद नहीं आ रही थी, कुछ घड़ी फोन  देखता रहा, कुछ घड़ी दीवार और पंखे की गंदी पत्ती। कुछ पुरानी तस्वीरों और वॉइस नोट्स से उन दिनों में लौटा, जिन दिनों को सोच लेने पर अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं होता.. छाया मत छुना मत का एक पुराना रिकॉर्ड सुना, अखरावट के कुछ पद पढ़े। सुबह को नींद आई। नींद लाने के लिए बड़े जतन करने पड़ते हैं। अजीब है, जागने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। दिन कई करवटों में बीता। सम्भवतः रात भी ऐसे ही बीते। हम कभी कभी बीते दिनों की गंदगी साफ करने में आने वाले दिन को बर्बाद कर लेते हैं।  इन दिनों घूम फिर कर राजन जी म...

प्रीति रहै इकतार

                  एक शब्द है 'होना' आपने इसे किस तरह जिया है ? आप किसी के लिए कितना वह हो पाए जो वह चाहता है ? क्या यह कहना अनुचित होगा कि यूँ ही होने से बेहतर होता है किसी के लिए होना, किसी का होना।  यह बिन सिर पैर की बात है क्योंकि इस बात का सिर और पैर तर्क से देखा नहीं जा सकता। यह भावनात्मक अनुभूति है जो यूँ ही छोटी बहन से संवाद करते हुए एक वाक्य के श्रवण मात्र से मेरे भीतर उपजी, भीतर जैसे कुछ कौंधा मैं देर तक सोचता रहा उस वाक्य को, देर तक सोचने के बाद  मुझे महसूस हुआ कि ऐसे वाक्य परिवार में ही बोले सुने जा सकते हैं। क्या कभी किसी ने आपसे बोला की वह आपको अकेले छोड़कर नहीं जाएगा ? नहीं बोला होगा ! मुझसे नहीं बोला किसी ने मैं हर जगह अकेला छूट जाता हूँ। घर परिवार में, रिश्ते में, दोस्तों में, अपने में भी.. क्यूँ ? पता नहीं। शायद मैं सबके साथ होने का प्रयास करता रहता हूँ इसीलिए।  'प्रीति रहै इकतार' इसे फिर पढ़िए, पढ़ा ? अब बताइए कुछ समझ आया ? नहीं आया तो फिर पढ़िए, हर चीज व्याख्यायित नहीं की जा सकती है। यह कबीर के एक दोहे के द्व...

इस राह में जो सब पे गुजरती है वो गुजरी

अपना तमाम जीवन निचोड़कर भी वह नहीं हो पा रहा हूँ जो होने का सपना बुनता हूँ। सिर्फ़ सपना ही नहीं बुनता अपने सामर्थ्य से बढ़कर श्रम करता हूँ। पिछले 15 सालों से नहीं जानता हूँ अपने लिए जीना किसे कहते हैं, अपने आप से पहले जुड़े लोगों का सोचा उम्र से कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, मैं नहीं जानता बचपना कुछ होता है, या बैचलर जैसी ज़िंदगी होती है, हमेशा लगा मैं जिम्मेदार हूँ, यह मुझमें किसी ने भरा नहीं या न जाने कैसे आ गया, बहनों को बेटियों की तरह महसूस किया, प्रेम किया तो अपने कहे से अधिक जिम्मेदार हो गया , प्रेमी की तरह कभी जिया ही नहीं, मन मारने की ट्रेनिंग मैं वर्षों से ले रहा हूँ।  मुझे मांगना और मरना एक जैसा लगता है मगर प्रेम माँगा .. हाँ माँगा। मैंने उसी एक स्त्री से कुछ माँगा.. उसने अपने भीतर का डर तोड़पर मुझे स्वीकार किया। मगर समाज हमारे गले पड़ा रहा, सच्चाई, और पवित्रता जैसी दो-मुँही तलवार हमेशा हमारे बीच लटकी रही, हम गले भी लगे तो अगले ही पल एक दूसरे से दूर को गए की पवित्रता न भंग हो जाए, हम अपने परिवार की दृष्टि में झूठे न हो जाएं.. जबकि यह बस हमारा व्यक्तिगत चुनाव होना चा...