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पता नहीं क्या , मगर कुछ

ज़िंदगी की गाड़ी जैसे ही पटरी पर चढ़ने लगती है कोई कहीं न कहीं से कुछ ऐसा प्रबंध कर देता है कि फिर उतर जाए और उतर जाती ही है क्योंकि आदमी के जीवन में रिश्तों का जाल ऐसा है कि जाल का कोई एक धागा कहीं से टूटे टूटता पूरा जाल है। मन जैसे ही कही न कहीं से आश्वस्त होने लगता है कोई न कोई घटना ऐसी घट जाती है कि ..  दिन अजीब सा बीता, कल शाम से मन थका सा था, टूटा सा कुछ कुछ वह बना रहा, कुछ कुछ पढ़ पाया, सोची हुई योजना पर समय ने अपनी योजना रखी और कुछ भी मन का नहीं हो सका। चिल्लाते लड़ते और कुछ जनों के गंवारपने पर कोफ़्त खाते बीत गया। भीतर इतनी बातें, इतना क्रोध इकट्ठा हो गया था कि शरीर उसे पचा नहीं सका। अन्ततः ख़ूब उल्टियां हुईं। एक मित्र दिल्ली से आए थे उन्हें समय न दे सका, दुःख इस बात से अधिक है कि वह समय मैं न अपने को दे सका न अपने मन को ही। बस कल्पता रहा, भीतर एक अजीब सी कुढ़न होती है। कभी कभी मन होता है अपना सिर फोड़ दूँ। कल मुझे देर रात तक समझाया गया था, मैं उसे लागू करने का प्रयास कर रहा था और फिर आज.. मैं जिस चीज़ से जितना कटना चाहता हूं उतना ही फँसता जाता हूँ। अब तो लगने लगा है ऐसे ही फँसे फँस...

अन-कथ

रात नींद नहीं आई। बीता सब पढ़ता रहा। तस्वीरों और आवाज़ों में खोया रहा। एक आवाज़ मुझसे कहती रही 'छाया मत छूना मन' लेकिन मन छाया में ही घूमता रहा। इन दिनों धूप बहुत तेज है। मेरी त्वचा जल गयी है। खुद के कहे, लिखे शब्दों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि मैं अब अपनी माँ का बेटा नहीं बचा हूँ। मैं अब उसकी औलाद हूँ। वो जिसने मुझे नया जन्म दिया।  मैं बचपन में जितना क्रोधी ज़िद्दी और अकड़ से भरा हुआ आदमी था अब उतना ही शांत और सामंजस्य वादी हो गया हूँ। मैं परिवार का आदमी हो गया हूँ। पिछले कई वर्ष से मैं अपने परिवार में साम्य बनाने का प्रयास करता रहा, वो सब किया जो शायद आगे 40 की उम्र के बाद करना पड़ता। लचक और समझ यूँ नहीं मिलती बोझ और जिम्मेदारी हमें वो सीखा बना देता है जो हमने बचपन में सोचा था कभी नहीं होंगे। देखे सपने और मिले आश्वासनों पर नए आश्वासन की चकती लगाता रहा। मेरी कथरी में अनगिनत छेद हो गए हैं। मैं उसपर सुंदर रंगीन चद्दर बिछाकर छिपाने में लगा हूँ। अपने लिखे को पलट पलटकर पढ़ा। कुछ योजना जो सालों पहले बनायी थी वो आज तक अपने किसी रूप में नहीं पहुँची। आज हम सब जिस दशा में हैं वहाँ तक...

कहीं बे-ख़्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने

बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।  मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।  ***********  सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ ...

नीली रौशनी आ रही है कहीं से

सोचता हूँ नहीं बताऊंगा। नहीं बताने का एक ही तरीका है सामने न पड़ना या बात न करना। पर जैसे ही बात होती है सब बक बक बोल जाता हूँ। भूल जाता हूँ दूर बैठा व्यक्ति मुझसे पहले भी तमाम बातों से जूझ रहा होगा। मन या तो कहीं खुलता नहीं या जहाँ खुलता है वहाँ फिर झूठ नहीं बोल पाता।मैं तुम्हारे सामने तुम्हारे लिए निरावरण हूँ। तुम तय करो तुम्हें कैसे देखना है। देखना भी है या नहीं। दिन लगभग बिस्तर पर, जमीन पर घुरचते बीता। ऐसी दैहिक पीड़ा दिनों बाद नसीब हुई। काश यह बीमारी इतनी बढ़ती की मेरे पास चली आती तुम.. कोई न कोई तो तुम्हें सूचना दे ही देता। मैं न बुलाता तो भी।  मैं बुलाने से डरता हूँ। नहीं आई तो .. ? ख़ैर ! एक स्कूल के दोस्त की बहन आईं थी। उन्हें बस तक छोड़ना पड़ा। आदर्श और बदर आए थे। कुछ इधर उधर की बातें हुई। चाय पिया गया। भईया आए थे दोपहर में तो खाना नसीब हो गया था। वो डाँट कर खिलाते हैं। कल रात से एक अजीब सी खलिस है सीने में उसके लिए शब्द नहीं है मगर है.. बहुत निजी है।  कुछ पढ़ लिख नहीं पाया। अभी बैठा था तो अनुवाद वाला काम देखने का प्रयास कर रहा था। मन नहीं किया। डायरी खोलकर सोचा...

दिन-विषयक

मन क्या चाहता है अगर यह तय कर पाना इतना ही आसान होता तो मन होता ही नहीं। कुछ और होता जो मन का वो काम करता जो मन बहुत सोच विचार करके करता है। स्थिर। एकलीक। बस मन का।  आप क्या चुनते अगर आपको लोक मर्यादा और मन के जीवन में से एक चुनना हो ? आ हाँ ... रुको फिर से सोचो ! हड़बड़ी में नहीं, मन भर सोच लो। फिर जवाब दो। कैसे निकलोगे रोज घर से बाहर ? कैसे नज़र मिलोगे माँ बाप से.? क्या बस खुद से नज़र मिला लेने से ही सब ठीक हो जाता है ? नहीं ! कभी नहीं, यह सम्भव ही नहीं। अपने से ज्यादा अपनो का जीवन महत्वपूर्ण होता है। ऐसी जगहों पर हम मर ही जाते हैं। मर ही जाना चाहिए। जीने के लिए जरूरी है। मर जाना।  हरारत। बुखार। दो चार बार उल्टी। आँख से पानी भी। सुबह से 4 टेबलेट खा चुका हूँ। अब राहत है।मन में असफलता का बोझ। खुद से  दो चार कठिन सवाल। मन में बेवजह बवाल। अपने ही सिर के खींचते रहा बाल। जीने की लालसा में क्या कर लिया है हाल। काश! बनारस ही किसी घाट पड़ा होता । उलटते पलटते बीती रात। मगर.. ख़ैर.. यह भी भला है कोई काम की बात।  काम की बात ?  ― 23 फरवरी 2025 / 7:30 शाम