सोचता हूँ नहीं बताऊंगा। नहीं बताने का एक ही तरीका है सामने न पड़ना या बात न करना। पर जैसे ही बात होती है सब बक बक बोल जाता हूँ। भूल जाता हूँ दूर बैठा व्यक्ति मुझसे पहले भी तमाम बातों से जूझ रहा होगा। मन या तो कहीं खुलता नहीं या जहाँ खुलता है वहाँ फिर झूठ नहीं बोल पाता।मैं तुम्हारे सामने तुम्हारे लिए निरावरण हूँ। तुम तय करो तुम्हें कैसे देखना है। देखना भी है या नहीं।
दिन लगभग बिस्तर पर, जमीन पर घुरचते बीता। ऐसी दैहिक पीड़ा दिनों बाद नसीब हुई। काश यह बीमारी इतनी बढ़ती की मेरे पास चली आती तुम.. कोई न कोई तो तुम्हें सूचना दे ही देता। मैं न बुलाता तो भी।
मैं बुलाने से डरता हूँ। नहीं आई तो .. ?
ख़ैर !
एक स्कूल के दोस्त की बहन आईं थी। उन्हें बस तक छोड़ना पड़ा। आदर्श और बदर आए थे। कुछ इधर उधर की बातें हुई। चाय पिया गया। भईया आए थे दोपहर में तो खाना नसीब हो गया था। वो डाँट कर खिलाते हैं। कल रात से एक अजीब सी खलिस है सीने में उसके लिए शब्द नहीं है मगर है.. बहुत निजी है।
कुछ पढ़ लिख नहीं पाया। अभी बैठा था तो अनुवाद वाला काम देखने का प्रयास कर रहा था। मन नहीं किया। डायरी खोलकर सोचा आज का दिन सहेज लूँ।
सम्भवतः मैच आ रहा है सब इतने व्यस्त हैं कि आवाज़ तक नहीं सुनाई दे रही किसी के पुकार की.. मनोरंजन बड़ी जरूरी चीज़ है इस सदी के लिए।
दोपहर जब रोटी खा रहा था तो श्रीकांत याद आ रहे थे। वो कहते हैं
' एक बार उड़ जाने के बाद
इच्छाएँ लौटकर नहीं आतीं
किसी और जगह पर
घोंसले बनाती हैं'
मेरे पास तो कोई जगह भी नहीं। इस 10 बाई15 के कमरे के अलावा । इसका भी किराया भरना है अभी।
घर से यह आदेश हुआ है कि बड़े पिताजी की बड़ी लड़की यानि मेरी बड़ी बहन का स्वास्थ्य ज्यादा खराब है डायलिसिस चल रहा है तो वहाँ चले जाना। जो भी हो है तो अपना परिवार ही। ऐसे वक्तों में खड़ा हो जाना चाहिए। मेरे मन से उतर गए हैं सब। मुझे न जाने क्यूँ लगता है ही नहीं मेरा अब कोई परिवार है। इसी परिवार की वजह से खून के आसूँ रोया हूँ मैं। मैं एक बार हाथ फैलाता हूँ। एक भर खोलकर कहता हूँ मन अगर मिला तो ठीक नहीं तो नहीं चाहिए होता कुछ। जैसे पिछले दिनों ही सोची एक बात बचा पाया तो बचाए रहूँगा।
किसी के लिए ... नहीं। कुछ नहीं।
पिताजी कह दिए हैं तो जाना तो है ही। चला जाऊँगा। जानता हूँ वहाँ बहुत अजीब व्यवहार होगा। मगर ठीक है अपनों के लिए क्या अपमान क्या सम्मान..
मुझे ठंडी लग रही है। काश! तुम होती। तुम तो जानती हो ऐसी बीमारी की दशा में मैं क्या ख़ोजता हूँ..
महादेव..
― 9 मार्च 2025 / 6:30 शाम
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देह का दुःख देह और मन का दुःख मन से ही मिटाता जा सकता है।
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मैं इतना मशीनी क्यूँ हूँ ? क्यूँ नहीं हो पाता थोड़ा सा लापरवाह!
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मैं पुकारना चाहता हूँ । कराहने का मन कर रहा है। आँख जल रही है।
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हर जगह एक विडंबना मुँह बाए खड़ी है। किसी भी ओर मुँह करो लगता है वह दिशा लील लेगी अभी। क्या कोई दिशा सुरक्षित दिशा नहीं ? क्या कोई भी मन साफ मन नहीं ?
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सफाई देने से सच धूमिल हो जाता है। नहीं देना चाहिए।
आत्मा साफ उजला कपड़ा है उसपर अस्थि चर्म युक्त देह चढ़ते ही वह गन्दी हो जाती है। मगर बिना देह के आत्मा का अस्तित्व बस एक प्रश्नचिन्ह है। साफ को साफ बचाए रखने का एक ही तरीका है। उसे साफ करते रहिए। पछीटते रहिए।
― 8: 30 शाम
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