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बे-रंग का रंग

एक अनकही टीस । कोई टूटन। होने और न होने का भरम। कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा और कहीं न हो पाने का दुःख। मन एक कन्धा ख़ोजता रहा। देह एक कोना। दोनों नसीब नहीं। सारे वातावरण में रंग उड़ रहे हैं, हमारे यहाँ रंग उड़ गया है। अब आगामी हर होली इस एक वाक्य से इस एक कमी से इस एक नमी से सामना होगा जो हर बार इसी रूप में होगा कि अभी वो होती तो कितना अच्छा होता। परिवार पूरा साथ आखिरी बार 2014 में दीदी की ही ( जो अब नहीं हैं)  शादी के समय होली में था। वह होली सच में रंग वाली होली थी। परिवार के साथ और प्यार के रंग वाली। और त्यौहार तो लगभग आधे अधूरे ही बीतते हैं। बीतेंगे आगे भी भविष्य में। हमारी चाहना ने हमारे जीवन से जीवन खींच कर निकाल दिया। 

ऐसा क्यूँ है कि सुख और शांति साथ नहीं मिलती। समृद्धि आती है तो शान्ति गायब हो जाती है। शांति आती है तो समृद्धि गायब। माया का जाल कितने फर्द का बना है आदमी एक बार उलझता है तो खुलता ही नहीं। 

ख़ैर ..!

सैकड़ों रंगपर्व की शुभकामनाओं पर कुछ नहीं बोल सका। 

सुबह से दाह के बाद की क्रियाओं में व्यस्त था। कल से अब तक जो किया जो सुना जो देखा मुझे यही समझ आया कि ये सारे संस्कार व्यक्ति को एक देह को आग देने की ग्लानि से छुटकारा देने , अपने के जाने का विचार एक साथ मन पर आक्रमण न कर सके इसीलिए रचे गए हैं ताकि आदमी व्यस्त रहे। भूला  हुआ जीवन जीकर ही इस कष्टमय जीवन की कँटीली राह पार किया जा सकता है। 

एक परवाह, मन में चलता नाम, इस थकन में सुख की शैय्या है। मैं जिसकी ओट में कुछ पल को सुस्ता लेता हूँ। 

आज तुम्हें जिस हाथ से रंग पहले लगा होगा मैं वही हाथ हूँ। तुम जिस रंग में होगी मैं उसी रंग में हूँ। 

मैं धोबी के पाट का वही पत्थर हूँ जिस पर पछिटे जाते हैं तमाम गंदे कपड़े और साफ हो जाते हैं। 

मैं एकदम ठीक हूँ। ठीक बने रहना ही मेरी नियति है। 

― 14 मार्च 2025 / 6: 30 शाम 

टिप्पणियाँ

  1. हम जाने कितने बोझ लिए चलते रहते हैं। 'जहां होना था और जहां नहीं थे' के पछतावे के साथ। मुझे नहीं पता ये रास्ते हमें कहां ले जा रहे हैं। जब मैं नहीं हूॅं ' पर मैं हूॅं ' के वाक्य को‌ महसूस करना।

    🫂🌸

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