यूँ नहीं है कि मैं कुछ सोचने से बचता हूँ। अजब बात है, सोचने से भी बचा जा सकता है भला ? प्रयास तो किया ही जा सकता है। करता हूँ। किया। न जाने क्यों कल रात से ही मुझे रह रहकर रुलाई फुट पैड रही है। लग रहा अजीब सा खालीपन है। कोई याद है। पेट में मरोड़ सी होती है। दो चार आँसू गिरते हैं, सर पर मारता हूँ, सीने पर हाथ रखे कहता हूँ सब ठीक है। और फिर कुछ देर ठीक होने सामान्य रहने का नाटक करता हूँ। नाटक कितना भी परिपूर्ण हो कुछ न कुछ तो बच ही जाता है। बच जाता है। खुल जाता हूँ। खुद से कतराता हूँ। न जाने क्यूँ ..
मैं वो हूँ जो इस डाल से उस डाल हो रहा हूँ और कहीं एक भी आम नहीं मिल रहा है। वहाँ था तो अकेले था 15 दिनों से बस दौड़ते बीता। अब यहाँ भी तो भी अकेले हूँ। क्या यही.. नहीं ! इतंजार की कोई सीमा होनी चाहिए। और न पूरे होने पर जब पूरा हो तो वह दुगुना होना चाहिए।
कुछ नहीं ।
कुछ कुछ पढ़ा। मन खराब हुआ। अपनी ही कविताओं से उलझा रहा। समझ नहीं आता मेरी कौन सी कविता है जो अच्छी है जिसे पढ़ा जा सकता है। कल एक जगह कविता पढ़ने जाना है। मन नहीं है। सम्मान वश जा रहा हूँ। बसंत सर के कहे की लाज रखनी है। यूँ अब कविता कहानी पढ़ने का कोई अर्थ बचा नहीं है। कवि इस जमाने में सबसे ज्यादा संदिग्ध है। दोहरेचरित्र के। बात पलटने वाले। जिसकी खुले मंच से बुराई करते हैं बन्द कमरे में वही करने वाले। कविता अपनी अस्मिता खो चुकी है। फिर भी न जाने क्यूँ सरकारों के निशाने पर रहते हैं लिखने वाले। ख़ैर सब बेमानी बातें हैं।
अजीब खीझ सी हो रही है। आशंका घेरे हुए है। बहुत कुछ अदृश्य दिख रहा है। ठीक हैमहादेव जानें सब
― 1 मार्च 2025 / 10 बजे रात
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