हम सब उम्मीद से ज्यादा किसी टीस के सहारे ज़िंदा हैं। टीस शायद ठीक शब्द होगा, अगर हम इसे खीझ कहें तो कोई ग़लत नहीं होगा। हॉं खीझ..खीझ ही हमें बचाए हुए है। समय से कुछ न हो पाने की खीझ, किसी से दूर रहने की खीझ, मन का जीवन न जी पाने की खीझ में हम जीवन को रगड़ा देकर जी रहें हैं। हम जीवन में जो कुछ तनिक या हल्के मार्जिन से चूक गए उसके लिए जीवन से भारी शुल्क उसूल रहें हैं। हमारी जीवन शैली ऐसी है कि जीवन भी अब जीवन रूप में आने से डरने लगा है। कल की रात नींद नहीं आ रही थी, कुछ घड़ी फोन देखता रहा, कुछ घड़ी दीवार और पंखे की गंदी पत्ती। कुछ पुरानी तस्वीरों और वॉइस नोट्स से उन दिनों में लौटा, जिन दिनों को सोच लेने पर अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं होता.. छाया मत छुना मत का एक पुराना रिकॉर्ड सुना, अखरावट के कुछ पद पढ़े। सुबह को नींद आई। नींद लाने के लिए बड़े जतन करने पड़ते हैं। अजीब है, जागने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। दिन कई करवटों में बीता। सम्भवतः रात भी ऐसे ही बीते। हम कभी कभी बीते दिनों की गंदगी साफ करने में आने वाले दिन को बर्बाद कर लेते हैं। इन दिनों घूम फिर कर राजन जी म...