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आशा हमें साँस देती है, उम्मीद ताकत

मन लगातार द्वंद्व से जूझता रहता है। क्या मन की निर्मित ही इसीलिए हुई की वह व्यक्ति को कभी स्थिर चित्त न रहने दे ? शायद इसीलिए लिए। स्थिर चित्त तो ज़िंदा लोगों का हो ही नहीं सकता ! वो संत हो या सामान्य आदमी।  मन का कह देने में अदभुत सुख है, लेकिन कह देने के बाद मनोनुकूल न सुन पाने का दुःख ? उसका क्या ? वह दुःख ही होता है न ? या अपने व्यक्तित्व पर जन्मा संदेह, सम्भवतः संदेह ही ! क्योंकि जब हम अपने करीबियों से वह नहीं सुन पाते जो सुनना चाहते हैं तो अपने व्यक्तित्व पर ही संदेह होता है कि कहीं मैं ही वह भावना व्यक्त करने में असमर्थ तो नहीं।  प्यार और आभार मन भर जताते रहिए। अपने प्रिय को कहते रहिए कि वह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है। यही एक राह है जिससे दुनिया से लगातार मिलते घावों को सहकर सुंदर जीवन जिया जा सकता है। पिछली बार कब ऐसा हुआ कि आपने अपने परिजन अपने प्रियजन से कहा कि ' मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ' नहीं कहा तो कहिए ! कोई पता नहीं कौन सा संवाद आखिरी संवाद हो  जब जब कहीं कोई दुर्घटना होती है मैं तमाम हताहत चेहरे और शून्य पड़ चुकी देह में अपने को ही मरा हुआ औ...