'जा रही हूँ / रहा हूँ ' , 'इंतज़ार' , 'सब ठीक हो जाएगा' , इतना सुन लिया है कि अब किसी के होंठ से इन शब्दों की आहट भी महसूस होती है तो मन करता है उसे तेज से गले लगाऊं और कहूँ मत कहना जो अभी कहने जा रहे हो.. मेरी आत्मा अब 'आ रहीं हूँ' , 'हम साथ रहेंगे', 'आ जाओ ' जैसे शब्द सुनना चाहती है। मुझसे अकेले नहीं रहा जाता, अलग बात है मैं बहुत संवाद पसंद आदमी नहीं हूँ, मगर अपनों के होने की अनुभूति में जीना चाहता हूँ। परिवार में जितने सदस्य हैं उतनी जगह हैं, ज़िंदगी पहिए में बदल गयी है, पल भर को कहीं रहता हूँ अगले पल को कहीं.. थक हार कर जब बैठता हूँ तो लगता है कोई तो हो जो मुझसे मेरा मन पूछ ले, माँ के लिए पिताजी हैं, बहनों के लिए उनके पति, किसी के लिए कोई , मेरा न कोई भाई है न कोई दोस्त, मैं भी कहीं हूँ या बस हूँ तो गिन लिया जाता हूँ। मैं हर दो लोगों के बीच अन्य की तरह जाकर खड़ा हो जाता हूँ, फिर थोड़ी देर में आभास होता हूँ मैं यहाँ नहीं हूँ तो हट जाता हूँ अकेले बैठा रहता हूँ कहीं। क्या मैं अकेले होता हूँ तो अकेले होता हूँ ? घर तो है ही नहीं। जहाँ जन...