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जो कुछ कहा जा सकता है

छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।  मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।  कहता हूँ और अपने कहे पर एक उदासीन भाव देखकर सोचता हूँ, काश !  यह कहा हुआ, अनकहा हो सकता या इस कहे की और उसपर न हुए अमल की स्मृति को मिटाया जा सकता तो मिटा देता, पर यह कहाँ सम्भव है। हम धीरे धीरे यह महसूस करते हैं कि हमारी ताकत, हमारा चार्म मिट रहा है और हम उसे मिटते देखते हैं।  भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको...

बे-रंग का रंग

एक अनकही टीस । कोई टूटन। होने और न होने का भरम। कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा और कहीं न हो पाने का दुःख। मन एक कन्धा ख़ोजता रहा। देह एक कोना। दोनों नसीब नहीं। सारे वातावरण में रंग उड़ रहे हैं, हमारे यहाँ रंग उड़ गया है। अब आगामी हर होली इस एक वाक्य से इस एक कमी से इस एक नमी से सामना होगा जो हर बार इसी रूप में होगा कि अभी वो होती तो कितना अच्छा होता। परिवार पूरा साथ आखिरी बार 2014 में दीदी की ही ( जो अब नहीं हैं)  शादी के समय होली में था। वह होली सच में रंग वाली होली थी। परिवार के साथ और प्यार के रंग वाली। और त्यौहार तो लगभग आधे अधूरे ही बीतते हैं। बीतेंगे आगे भी भविष्य में। हमारी चाहना ने हमारे जीवन से जीवन खींच कर निकाल दिया।  ऐसा क्यूँ है कि सुख और शांति साथ नहीं मिलती। समृद्धि आती है तो शान्ति गायब हो जाती है। शांति आती है तो समृद्धि गायब। माया का जाल कितने फर्द का बना है आदमी एक बार उलझता है तो खुलता ही नहीं।  ख़ैर ..! सैकड़ों रंगपर्व की शुभकामनाओं पर कुछ नहीं बोल सका।  सुबह से दाह के बाद की क्रियाओं में व्यस्त था। कल से अब तक जो किया जो सुना जो देखा मुझे यही सम...

बात की बात

आज शारीरिक तौर पर लगभग स्थिर रहा। मन यात्रा में रहा सुबह 8:30 बजे से ही। अभी भी है। यूँ लगता है यात्रा ही नियति है। मगर विपरीत दिशा की ओर। शारीरिक तौर पर आज बहुत नहीं, हॉं हल्की फुल्की यात्रा की। मम्मी को लेने गया था। पापा भी सुबह ही आए 10 बजे के लगभग। आते ही खेत में जुट गए। इंतज़ार कर रहे थे कि मम्मी आएं। वहाँ गया तो सब फैला हुआ था उसे समेटने लगा और मम्मी तब तक अपने घर सबसे मिलने लगीं तो लेट होने लगा। पापा एकदम गुस्साए हुए फोन किये, यहीं आठ किलोमीटर से आने में कितना समय लगता है। ख़ैर! जब मम्मी को लेकर आ गया तो उनका गुस्सा गायब हो गया था। मैं पापा मम्मी की गतिविधि पर बस नज़र रखता हूँ और सीखता हूँ कैसे रहा जाता है। अदभुत सामंजस्य। उत्कट प्रेम। एक दूसरे से ज्यादा कोई महत्वपूर्ण नहीं.. अपनी औलाद भी नहीं। पति पत्नी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए। वहाँ तीसरे की जगह होगी तो दिक्कत होगी। जीवन में कहीं तो सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, हॉं वह व्यक्ति उस समपर्ण की कद्र करने वाला हो तो उससे सुंदर रिश्ता कोई हो नहीं सकता। न बोलकर भी बोलना सीखा जा सकता है। बिना छुए छू लेने सा प्रेम। आभास इतना गहरा की पीठ पीछे क...

थकन

टूट रही है देह। मन.. मन जैसा नहीं है। पिछले कई घण्टों से बस खड़ा हूँ। भोज सम्पन्न हुआ। उम्मीद करता हूँ दौड़भाग का अब तिरोहन होगा। घर अभी आया लौटकर अकेले। मेरा कहाँ कोई होता है मैं सेतु हूँ मुझसे होकर लोग पार होते हैं, भूल जाते हैं। दीदी लोग कल चली जाएँगी अपने घर तो पापा भी वहीं रुक गए हैं। मम्मी वहीं हैं ही पिछले आठ दिन से। मैं ही दौड़ रहा हूं। हर रोज़ अकेले बैठकर कमरे पर मन भर आँसू बहा लेता हूँ। मन ठण्डा हो जाता है। भीतर अजीब सी खीझ भरती जा रही है। मुझे वह सीना चाहिए जिसमें मैं अपना चेहरा छिपाकर सो सकूँ। एक गोंद या एक हाथ जो मुझे सुला सके। बिस्तर पर अकेले पड़ा हूँ। आसपास आवाज तक का सहारा नहीं है। मैं आवाज़ देना चाहता हूँ। कहना चाहता हूँ.... गहरी थकन हावी है। भीतर लग रहा है जैसे कोई चल रहा है। काश! नींद आ जाए।  पिछले कुछ सालों से और इन दिनों जो जीवन देख रहा भीतर यह डर गहरे बैठता जा रहा कि मैं लावारिश की तरह मरूँगा। कही  किसी कमरे में कहीं पड़ा रहूँगा कोई देखने नहीं आएगा महीनों.. ख़ैर मैं मरने की तरह सोना चाहता हूँ।  ― 27/ 02 / 2025 / 10 : 20 रात