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मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

नए में नया कुछ भी नहीं

हर आम दिन की ही तरह रहा आज का दिन भी और कल की रात भी, रात में और आंख तर होती रही थी। भागकर घर चले जाने का मन होता रहा पर भागना कहाँ हो पाता जब एक बार जीवन जाल में फंस जाओ तो..  अकेले थे। बिल्कुल अकेले। जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। किताबें पढ़ने का प्रयास किया, असफल रहा। उसके बात करने का प्रयास किया, असफल रहा। नींद नहीं आई। सोचा हुआ न हो तो भीतर की सारी ऊर्जा देर तक मेरे साथ तो कई दिनों तक हिली सी रहती है, मैं बता भी नहीं पाता कि मुझे बुरा लग रहा है या मुझे ये चाहिए, दरअसल मुझे क्या चाहिए यह मैं जान ही नहीं पाता। सुबह पैदल दूर तक चलता रहा। सर्द इन दिनों बढ़ी हुई है। गलन से लगता है, नाक कान अँगुलियां कट जाएंगी। पर ऐसी सर्द सुबह में टहलना मुझे बहुत पसंद है, बड़ी नीरवता रहती है, आसपास धुंध के अलावा कुछ नहीं होते, इन दिनों कुत्ते के छोटे छोटे बच्चे टहलते रहते हैं, उनके साथ खेल लेता हूँ, एक ही तरह से बना हुआ मुँह कुछ पल को इधर उधर हो लेता है।  दोपहर तक सोचता रहा कोई तो नए वर्ष पर फोन कर दे, नहीं आया तो खुद ही कर दिया। उसे ही जिसे कर सकता हूँ बिना झिझक।  आज दिनों बाद मुझे लगा कि मैं ...

न चाहने की चाह में

जैसे कुछ अटक गया हो हलक में और मैं उसे कई जतन करके भी उगल नहीं पा रहा हूँ। कई कई दिनों की चुप्पी मुझपर इतनी चिपक गयी है कि मैं अब मुँह खोल रहा हूँ तब भी नहीं बोल पा रहा हूँ। सब कुछ उसी ढर्रे पर चल रहा है जैसे पिछले कई वर्षों से चलता चला आता है। रो कर सुख गई आँख आसुओं के खारेपन से कर्राए गाल पर एक पतली रेख सी खींच गई है। मैं उसे अपने फोन का फ्रंट कैमरा ऑन करके देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ सरस्वती नदी ऐसे ही सूखी होगी।  जाने क्या है मेरी नियति में जहाँ जहाँ मैं अधिक जुड़ जाता हूँ वहीं पराए की तरह अपने को महसूस करने लगता हूँ, एक दिन यूँ ही बात करते हुए देवव्रत ने कहा " अब आपके पास अपनी भाषा है अपने बिम्ब है गहरी संवेदना है अब आप कुछ बड़ा लिखिए कुछ ऐसा जो बस आप लिख सकते हैं, आपके तरह की भावुकता और वैचैरिकी समकालीन किसी गद्यकार के गद्य में नहीं दिखती"  उस दिन से अपने से सवाल करता रहा, मैं क्या लिखना चाहता हूं ? और मुझे कोई जवाब ही नहीं मिलता, मैं उस दिन से एक शब्द नहीं लिख पाया, कहाँ मैं रोज लिखता था कमसे कम दो हज़ार शब्द तो रोज, वो इन दिनों दो सौ भी नहीं हो सके, मैं प्रयास करता तो शब्...

चक्कर ही चक्कर है दुनिया में

जीवन आवृत्ति के सिवा क्या है? हम जहाँ से ऊबकर थककर परेशान होकर भागते हैं फिर वहीं लौट आते हैं न चाहते हुए भी,  इस आवृत्ति में ही सब शामिल होता जाता है और हम भारी होते जाते हैं। हल्के हम मृत्यु से भी नहीं होते, मृत्यु हमें हल्कापन नहीं देती, आवृत्ति का बोझ उठाए चलते रहने से थकी देह को आराम देती है कि लो बैठ लो आगे फिर चलना है, इस आवृत्ति में मिला बोझ उठाकर ही..  अनन्त का जो चिन्ह है उसे कभी करीब से देखो तो कितना भयावह है वह, कोई ओर छोर ही नहीं..  कुछ शब्द बार बार मन में घूमते हैं, उन्हें लिख चुका हूँ, फिर उन्हें लिखना नहीं चाहता, अब उन्हें सोचना भी नहीं चाहता, फिर भी वो मेरा पीछा नहीं छोड़ते.. काश छोड़ देते !  कई सालों के कैलेंडर उठाकर देख लिया है, उसमें कोई ऐसी तारीख नहीं जिसमें मैं पूरा दिन सुख से जिया होउँ, चिंता, अपमान, ग्लानि, नाम की कोई रस्सी हर दिन मेरा गला कसती गई है। कसती गई है। धीरे धीरे मैं कसाव का आदी हो गया। अब मुझे कसाव और जकड़न में ही चलने की आदत है, स्वतंत्रता में चलने में बड़ा अजीब महसूस होता है।  जीवन के बीतते हर दिन के साथ मैं यह महसूस करता जा रहा ...

टूटने पे आए तो कोई ऐसे टूटे

हर दिन एक नए टुकड़े में टूटते हैं और देखते हैं कि कोई उसमें देख रहा है खुद को फिर उस टुकड़े को जोड़ते नहीं कि उसकी छवि न बिगड़े, हम अपने को बिगाड़ लेते हैं, इस सिलसिले में एक टुकड़े भर भी नहीं बचे हैं। जैसे एक बड़ा सा आईना टूटे तो कई छोटे छोटे आईने हो जाते हैं वैसे ही एक जीवन टूटे तो वह भी कई जीवनों को जीवन देखने भर की सहजता दे देता है। हम वैसे ही हो गए हैं। मन की तरह मेरी कलम की इन दिनों हताश है लगभग टूटी हुई सी, सोचता कुछ हूँ लिखता कुछ हूँ। चाहता हूँ कुछ कहता हूं कुछ, स्वीकार कुछ और करता हूँ  कुछ आने की आहट में जो उत्सुकता और आकुलता जन्मती है, वो उसके जाने के बाद एक गहरी वीरानी के रूप में उभरकर हृदय पर छा जाती है। मन कहीं का होकर भी कहीं का नहीं होता। हँसने हँसाने के हर जतन बोझिल लगते हैं। चाह की राह पर मन न होते हुए भी डाइवर्जन का साइन बोर्ड लगाना पड़ता है। आप देखते हैं कि वो रास्ते और लोग अंजान से हो गए हैं जिन्हें आप जानने का दावा करते रहे हैं। भरी भीड़ में आप अकेले खड़े हैं अपने किए कर्मों की डायरी लिए हुए जो आपने औरों के लिए किए थे। जिसके आप भी हकदार थे, लेकिन आया आपके हिस्से कुछ न...

फिर वही रात है

आज मेरा जन्मदिन था। लगभग और दिनों की तरह ही बीता , कुछ प्रिय जनों ने विशेष महसूस करवाया। विशेष होने की अनुभूति से बचते हुए भी विशेष होने की अनुभूति घेर ही लेती है। यह अनुभूति भीतर अजीब सी चुभन पैदा करती है तब और ज्यादा जब आप जानते हों कि आपने साल दर साल असफलता की एक ऊँची इमारत खड़ी करने के अलावा कुछ विशेष नहीं किया है। सुबह से कई सारे फोन आए कुछ उठा सका कुछ नहीं। सैकड़ों मैसेज, और स्टोरीज के जवाब अब भी बचे हुए हैं। सबने याद रखा। सबने प्यार दिया। फिर भी पूरा दिन एक अजीब-सी खाली जगह बनी रही, जैसे कोई मेरे सीने में बड़ा-सा छेद कर गया हो और उसे कोई देख ही न पाए। सुबह देर से सोकर उठा, लगभग दोपहर में, फिर और सो गया तो चार बज गए, दिन बिल्कुल सुखद रहा, दिनों बाद सुख की नींद नसीब हुई। शाम को रोहित लोग आए तो बाहर गया, सब किताबें लेकर आए थे, मैं उन सबका प्यार देख भावुक हो गया, अभी सब बेरोजगार हैं और इतना प्रेम..मैं कुछ नहीं कर सका आजतक उन लोगों के लिए।  केक कट किया गया, तस्वीरे ली गईं, हँसी हुई और फिर सब अपनी अपनी दुनिया में। अब कमरे में मैं अकेला बैठा हूँ। केक का आधा हिस्सा फ्रिज में पड़ा है...

मैं किस दरवाजे से आया था

बीते तीन दिन बिस्तर पकड़े बीत गया, बुखार और सर्दी ने जो हाल किया है कि पूछो मत। आज गले से कुछ आवाज निकल रही थी, इन दिनों में बस एक मौन स्वर में पुकारता रहा कि काश कोई तो कुछ घड़ी बैठे मेरे सिरहाने, पर यहाँ इस शहर में अकेले पड़ा हूँ, कभी कभी सोचता हूँ, कहीं किसी दिन ऐसे मर गया तो लोगों को पता भी बड़ा देर से ही चलेगा। कहने को इतना.. ख़ैर  सारे जतन किए जिससे जितना जल्दी ठीक हो सकूँ हो जाऊँ पर यह सही होने का नाम नहीं ले रहा, आज दोपहर में बुखार यूँ था की देह काँप रही थी। इन दिनों में कुछ नहीं किया बस बिस्तर पकड़े पड़ा रहा, कुछ कविता संग्रह पलटता रहा, कुछ कहानी पढ़ी, दो फिल्में देखी, 'बारामुला' और 'स्कारफेस'.. दोनों अपने आप में अपने कॉन्सेप्ट में अदभुत हैं। कश्मीरी पंडितों पर हुई बर्बरता को बारामुला में जिस ढंग से दिखाया गया है वो बिल्कुल नए ढंग का है, बिल्कुल कसा हुआ निर्देशन, मन काँप के रह जाता है।  स्कारफेस 80 के दशक में क्यूबा शहर के शरणार्थियों और ड्रग माफिया गैंग की कहानी है, फ़िल्म में अल पचिनो ने अपूर्व काम किया है, उनके हाव भाव से दहशत भरती है वह देर तक रहती है।  आज दिन भर कु...

पता नहीं क्या , मगर कुछ

ज़िंदगी की गाड़ी जैसे ही पटरी पर चढ़ने लगती है कोई कहीं न कहीं से कुछ ऐसा प्रबंध कर देता है कि फिर उतर जाए और उतर जाती ही है क्योंकि आदमी के जीवन में रिश्तों का जाल ऐसा है कि जाल का कोई एक धागा कहीं से टूटे टूटता पूरा जाल है। मन जैसे ही कही न कहीं से आश्वस्त होने लगता है कोई न कोई घटना ऐसी घट जाती है कि ..  दिन अजीब सा बीता, कल शाम से मन थका सा था, टूटा सा कुछ कुछ वह बना रहा, कुछ कुछ पढ़ पाया, सोची हुई योजना पर समय ने अपनी योजना रखी और कुछ भी मन का नहीं हो सका। चिल्लाते लड़ते और कुछ जनों के गंवारपने पर कोफ़्त खाते बीत गया। भीतर इतनी बातें, इतना क्रोध इकट्ठा हो गया था कि शरीर उसे पचा नहीं सका। अन्ततः ख़ूब उल्टियां हुईं। एक मित्र दिल्ली से आए थे उन्हें समय न दे सका, दुःख इस बात से अधिक है कि वह समय मैं न अपने को दे सका न अपने मन को ही। बस कल्पता रहा, भीतर एक अजीब सी कुढ़न होती है। कभी कभी मन होता है अपना सिर फोड़ दूँ। कल मुझे देर रात तक समझाया गया था, मैं उसे लागू करने का प्रयास कर रहा था और फिर आज.. मैं जिस चीज़ से जितना कटना चाहता हूं उतना ही फँसता जाता हूँ। अब तो लगने लगा है ऐसे ही फँसे फँस...

जीवन के इंद्रजाल में

इन दिनों में मन बासी भोजन की मानिंद हुआ रहता है। मिर्च मसाला पाक सब सही होने के बावजूद स्वाद गायब है, स्वाद उस भीतरी गर्मी से था जो भोजन में अब नहीं है।  कल की शाम खुशनुमा थी। आलोक ही आलोक था चारो तरफ, पटाखों की गूंज थी और दीपों की रौशनी। पर यह आलोक मनुष्य की उपस्थिति से धूमिल हुआ जाता था, अब हर जगह आदमी इतने हो जाते हैं कि कितनी भी व्यवस्था हो वह अव्यवस्था में बदल जाती है। मुझे साथ सुंदर लगता है, लेकिन सबका नहीं, सबके साथ को साथ कहा भी तो नहीं जा सकता, साथ वही अच्छा है जहाँ दो मस्तिष्क एक तरह की जीवन शैली के आसपास के हों, उनके पैरामीटर लगभग एक जैसे हों। इन सबके बावजूद जो सबसे जरूरी सेतु है किसी साथ में वह है टॉलरेंस और अपने से ऊपर किसी को रख सकने की क्षमता।  मौसम अब नम हो चला है, हवा न भी चल रही हो तो भी लगती है, ठण्ड अपने पांव पसार रहा है। मैं यूँ ही हल्की हवा और धूल से छींकने लगता हूँ, वही हुआ।  कुछ क्षणों को ख़त्म नहीं होने देने का मन करता है। कुछ साथ बिल्कुल नहीं छोड़ने का मन करता है, पर..  कभी कभी सोचता हूँ क्या मैं सबको विदा कहने के लिए ही बना हूँ क्...

जो कुछ हो सकता था

बहुत लंबी कविता हो या कहानी बोझिल हो जाती है, भावनाओं को ज्ञान से पाट देना किसी विद्या में सत्यापित नहीं हो सकता। अगर ज्ञान देना है या कोई तर्कसंगत बात करनी है तो निबंध या या लेख रूप है कविता कहने या कहानी कहने की जरूरत क्या है ?   मैं नहीं स्वीकार पाता। भावनाओं में तर्क कभी नहीं फिट हो सकता है। जहाँ होगा वहाँ भावना पीड़ित दमित होगी।  ********* मर्द बर्फ का पहाड़ है जिसे प्रेम की गर्मी से ही पिघलाकर जल किया जा सकता है और किसी से नहीं।  ******** दिन भर निगाह बार बार फोन पर ही रही। जाने क्या देखता अगोरता रहा। एक बात तो है.. इंतजार करने वाले को समय जितना बेहतर पता होता है उतना किसी को नहीं।  आज ख़ूब सोया हूँ, दोपहर में भी सो ही रहा था, आज व्रत था तो कुछ खाने पीने की चिंता थी नहीं, बस सोकर दिन काटने का जतन किया। कमरे के सामान  इधर उधर किया। कुछ पढ़ा। आज सातवें दिन बाहर कुछ दूर बाइक लेकर निकला।  गमले में लगाये हुए पौधों में फूल आ रहे हैं, इन दिनों अडेनियम और गुलाब खिल रहा है, रातरानी का पौधा बहुत छोटा सा है फिर भी दो चार फूल रोज रहता है। आज हरश्रिंगार में कुछ न...

जो कुछ कहा जा सकता है

छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।  मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।  कहता हूँ और अपने कहे पर एक उदासीन भाव देखकर सोचता हूँ, काश !  यह कहा हुआ, अनकहा हो सकता या इस कहे की और उसपर न हुए अमल की स्मृति को मिटाया जा सकता तो मिटा देता, पर यह कहाँ सम्भव है। हम धीरे धीरे यह महसूस करते हैं कि हमारी ताकत, हमारा चार्म मिट रहा है और हम उसे मिटते देखते हैं।  भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको...

किसको फुरसत है जो थामे...

मैं फुरसतिया आदमी हूँ, मैं इतना फुरसतिया हूँ मैं सबको याद करता रहता हूँ, और सब इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती। मैं एक दिन अपनी तमाम फुरसत को मौत के हाथ बेंच दूँगा जो हमेशा व्यस्त रहती है।  ******* मन कहाँ है यह तो मन भी नहीं जानता, हां इतना जरूर जानता हूँ कि जहाँ कहीं भी 'लेकिन' है वहाँ मन नहीं है।  ******** दिन भर बस दिन बीतने के इंतज़ार करता रहा। कुछ पढ़ा, ज्यादा सोचा, व्यस्तता के विषय में सोचता रहा।  ********* चिंघाड़े मार कर रोने का मन होता है, क्यूँ होता है पता नहीं, कोई दुःख नहीं, कोई उम्मीद नहीं है, न किसी से कुछ चाहिए, बस ऊब गया हूँ। किससे ऊब गया हूँ यह भी नहीं पता है।  मन नहीं कर रहा है कुछ लिखने का ! ―  24 oct 2025 

कुछ कुछ में से कुछ जो बच जाता है

प्राकृतिक तरीके से होने की सम्भावना को अपने तरह से कर लेने की इच्छा और न हो पाने / कर पाने  के कारण जो टीस पैदा होती है, वही टीस भीतर बनी रही। एक और इच्छा पर पानी फिर गया। मैं देर तक सोच रहा था यह कैसे स्वीकार करूँ, अनन्तः भावनाओं को जज्ब कर लेना ही उचित लगा। कर लिया। क्योंकि सच ही कहा है, कि 'आपन सोचा कुछ नहीं हरि सोचा तत्काल' और उस तत्काल को जीने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है। गौर से देखो तो हर कहीं एक गहरी खाईं हैं, समतल, समतल में भी नहीं, वह भी खाईं ही है।  जीवन खुली आंख से बन्द आंख की तरह चलना ही है।  आज बहुत कुछ लिखा, कुछ चिठ्ठी, कुछ मन के द्वंद्व पर सब बकवास, उन्हें नहीं पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि सब मेरे मन के विकार हैं। डिलीट कर दिया।  सुबह जब टहल के और व्यायाम करके लौटा तो एक तितली भी मेरे साथ कमरे में घुस आई थी, वो दिन भर यहीं फड़कती रही। जाने क्या खाई होगी, उसे भूख तो जरूर लगी होगी, मैं दाल चावल खा रहा था तो सोच रहा था वो भी खाती तो खिला लेता साथ.. मैं इतना कठोर तो नहीं कि तितली न पाल सकूँ। पर वो खाई नहीं, एक दो बार पकड़ने का प्रयास किया...

जाने किस चीज की कमी है अभी

लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है।  बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं।  आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ।...

रियाज़

दिन भर बस पड़ा रहा, इस करवट से उस करवट, आँखे सूज आईं थीं जाने क्यूँ, भीतर लगातार घबराहट होती रही है कल से ही, वो रुकने का नाम नहीं ले रही है। मैं बिस्तर जमीन कोना कुर्सी सब छान चुका हूं यह कहीं शांत नहीं हो रही है। ऐसा कुछ सोच भी नहीं रहा हूँ। ऐसा कुछ क्या कुछ भी सोच नहीं रहा हूँ, न किसी बात से परेशान हूँ, न कोई इच्छा या उम्मीद है। बस एक उब है। जाने किस चीज की लेकिन है। मैं फोन फेंक देना चाहता हूँ। मुझे किसी से बात करने का मन नहीं करता। किसी मतलब किसी से नहीं..  दिन भर में चार बार कपड़े बदले, कुछ किताबें उठाई रखीं, कई भजन कीर्तन सुने, कुछ ग़ज़लें भी.. जाने क्यूँ संगीत में खासकर शास्त्रीय संगीत में मुझे अद्भुत शांति मिलती है। देर तक राग रामकली सुनता रहा और बिस्तर पर पड़ा रहा। शाम एक फोन से उठा। आज दिन भर में किसी का फोन नहीं उठाया, बोलने का मन नहीं कर रहा था। सोच रहा हूँ सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रखना शुरू करूँ।  हम सब एक टूल हैं, जिसे हर दूसरा अपनी जरूरत अनुसार उपयोग में लेता है और फिर टूल बॉक्स में रख देता है। इस वाक्य का अर्थ क्या है मैं खुद नहीं जानता लेकिन लिख दिया क्योंकि चल ...

अब यही रोज़गार है अपना

मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं।  चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें...

ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर

सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया,  निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है। सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।  एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।  मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।  किसने बनाया ये नियम की कह दी गई बात वापस नहीं होगी ? देख लिया गया सपना भुलाया नहीं जा सकेगा ...

'अन' उपसर्ग की तरह है सब

जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है। हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं।  बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ।  जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं।  बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर ज...

रात्रिदग्ध एकालाप

जाने क्यूँ कल से लगातार मैं दो चीजें कर रहा हूँ, एक तो एक गाने को लगातार गाए जा रहा हूँ वो भी ऐसे गाने को जिसको सुना नहीं है शायद सालों से, जो मुझे पसंद भी नहीं है। यह अजीब लग सकता है कि पसंद नहीं है तो याद कैसे है और गा कैसे रहा हूँ, लेकिन यही सच है।  दूसरा यह कि मुझे बार बार जाने क्यूँ जड़त्व का नियम याद आ रहा है। पिछले दो साल से मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं स्मृति में घूमता रहता हूँ, भौतिकी पढ़े मुझे 8 साल हो गए होंगे या ज्यादा पर अब मुझे उसके एक सिद्धांत सूत्र और परिभाषा याद आते हैं। इसका क्या अर्थ है पता नहीं ! जड़त्व का नियम याद करते रहना चाहिए। जीवन का नियम भी यही है।  *********** मैं समझ नहीं पाता हूँ समय तेजी से गुजर रहा है या घटनाएं तेजी से घट रहीं हैं। मन लगातार भावनात्मक उठापटक का मैदान बना रहता है, एक पल को मन खुश होता है, एक पल को सशंकित, एक पल को चिड़चिड़ा, एक पल को रोमांटिक, एक पल को भयभीत, एक पल को अकेला, एक पल को बिल्कुल बुद्धू, एक पल को विशुद्ध वैचारिक, एक पल को आशंका से भरा हुआ, एक पल को बच्चा, एक पल को बड़ा, एक पल को भाई, एक पल को प्रेमी, एक पल को बेट...