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न चाहने की चाह में

जैसे कुछ अटक गया हो हलक में और मैं उसे कई जतन करके भी उगल नहीं पा रहा हूँ। कई कई दिनों की चुप्पी मुझपर इतनी चिपक गयी है कि मैं अब मुँह खोल रहा हूँ तब भी नहीं बोल पा रहा हूँ। सब कुछ उसी ढर्रे पर चल रहा है जैसे पिछले कई वर्षों से चलता चला आता है। रो कर सुख गई आँख आसुओं के खारेपन से कर्राए गाल पर एक पतली रेख सी खींच गई है। मैं उसे अपने फोन का फ्रंट कैमरा ऑन करके देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ सरस्वती नदी ऐसे ही सूखी होगी। 


जाने क्या है मेरी नियति में जहाँ जहाँ मैं अधिक जुड़ जाता हूँ वहीं पराए की तरह अपने को महसूस करने लगता हूँ, एक दिन यूँ ही बात करते हुए देवव्रत ने कहा " अब आपके पास अपनी भाषा है अपने बिम्ब है गहरी संवेदना है अब आप कुछ बड़ा लिखिए कुछ ऐसा जो बस आप लिख सकते हैं, आपके तरह की भावुकता और वैचैरिकी समकालीन किसी गद्यकार के गद्य में नहीं दिखती" 

उस दिन से अपने से सवाल करता रहा, मैं क्या लिखना चाहता हूं ? और मुझे कोई जवाब ही नहीं मिलता, मैं उस दिन से एक शब्द नहीं लिख पाया, कहाँ मैं रोज लिखता था कमसे कम दो हज़ार शब्द तो रोज, वो इन दिनों दो सौ भी नहीं हो सके, मैं प्रयास करता तो शब्द उतरते ही नहीं, मैं देर रात रात तक डायरी पर कलम रखे देखता रहता, पाँव ठण्ड से अकड़ने लगते, देह कांपती रहती, पर मैं एक शब्द नहीं पाता था, एक भी शब्द नहीं। 

इन दिनों में में और भी तमाम तरह के सपने बन रहे थे, मैं गिनती गिनते थक गया था, मुझे लग रहा था यह उस दिन के बाद रुक जाएगा, पर नहीं रुका, यह हर बार नई गिनती में तब्दील हुआ और मैं बस गिनता रहा, जैसे कोई खड़े हरे पेड़ पर पेट्रोल छिड़क के आग लगा दे मुझे बिल्कुल वैसे महसूस होता और मैं महसूस करता रहा।  मैं जानता हूँ सबकी परिस्थिति अलग होती है उसे उसी में जूझना है, लेकिन यह स्वीकार्यता बहुत देर से आती है। तब तक कई लोगों का दिल दुखा चुके होते हैं। हम अगर तुलनात्मक दृष्टि छोड़ दें तो लगभग दुःख का अवसान हो जाए, पर वो होता कहाँ है ? हम पेंडुलम की तरह लटकते रहते हैं, हम जस्टिफिकेशन चाहते हैं, हम सोचते हैं हम ऐसा कर सकते हैं तो वो क्यूँ नहीं ? जबकि यह सोचना कितनी बड़ी मूर्खता है, त्याग, प्रेम और एफर्ट कहकर नहीं करवाया जा सकता है या स्वप्रेरणा से होता है। यह तुलना से भी नहीं होता यह मन से होता है। हम सब अपने अपने तरह से बेहतर हैं और हम सब किसी की तरह से बेकार हैं। यही जीवन का हेड और टेल है जिसके बीच हमें उलटते पलटते रहना है। 


मैं जैसे कोई शाप हूँ या कोई ऐसा केमिकल जिसके छूने से पदार्थों का मूल गुण बदल जाता है। मैं जो चाहता हूँ वह चाहने की तरह पूरा ही नहीं होता, मैं ना चाहते हुए भी चाहने की तरफ बढ़ जाता हूं और कुछ न कुछ चाहने लगता हूं। हर बार यही होता है जबकि मैं कुछ भी नहीं चाहना चाहता मैं बस देना चाहता हूं पर देने के भीतर एक  पतली रेखा जरूर कहीं पाने की रह जाती है जो दुःख देती है। मैंने शब्दों को समय दिया खून पसीना दिया नौकरी दी, जीवन कि आर्थिक स्थिरता दी और जब मुझे लगा अब शब्द मेरा साथ देगा तो शब्द भी मेरा साथ छोड़ दिया, कितनी कहानी, कितनी कविता अधूरी पड़ी है, यह बिल्कुल मेरे जीवन में बने मित्रों की तरह रही जो बस मेरा इस्तेमाल करना जानते रहे, मेरे जीने मरने की इच्छा की सुध लेना नहीं। 


मैंने जिस घर के लिए सब त्याग दिया उस घर ने ही मुझे त्याग दिया, मैं अकेला खेलने की उम्र में बहनों की शादी खोजता फिरा,  दुनिया जहान से लड़ता फिरा, ताने सुनते और जूझते बिता दिया। अब भी मेरे भीतर जाने क्यूँ ये इच्छा कुलबुला जाती है कि सब एक हो जाएं। इलाहाबाद कई वर्ष रहा, यहां के लगभग लोगों के दुःख परेशानी में खड़ा रहा, कुछ कुछ जनों के लिए तो तब भी दौड़ता रहा जब लोग घरों में छिपे रहते थे, पर जब कहीं मेरे लिए स्टैंड लेने का नाम आया वो भी पलट गए। इस शहर ने एक स्त्री दिया उसे भी इतना गिल्ट शर्म झिझक आसुंओ से भर दिया कि साथ खड़ी होते हुए उसे भारी लगता है, मैं उसे हल्का करता हूँ तो अपने व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा लेता हूँ, कितनी अजीब और तुच्छ मानसिकता है लोगों की..

आज जाने कैसे शब्द उतर रहे हैं मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूँ, मुझे वैसे ही लग रहा है जैसे बच्चे को जन्म देने के कई महीनों बाद कोई स्त्री अपने स्तन में दूध उतरने पर करती होगी.. मुझे उसके स्तन याद आ रहे हैं, उसकी गन्ध भी, वह जो मेरी माँ है। 

यहाँ लगभग दिन अकेले बीतते हैं, गहरी चुप्पी ओढ़े हुए, अपने आप से ही लड़ते हुए, कितनी देर आप किताब पढ़ सकते हैं ? कितनी देर आप फोन स्क्रोल कर सकते हैं, कितनी बार आप हर उत्सव के दिन अकेले रह सकते हैं .. कोई तो गिनती होती होगी। 

अब पुकारने पर भी कोई पलटकर आवाज नहीं आती है, आती भी है तो बहुत सधी हुई, आप जानते हैं इसके बाद आप बोल नहीं पाएंगे। 

हर आदमी के पास इतने एक्सक्यूज हैं कि अपनी समस्या बताने से पहले डर लगता है, जबकि समस्या कोई नहीं है आप चाहते हैं आपकी आवाज का महत्व बचा रहे, आपको न कहना पड़े याद आ रही है, न लेकर बैठनी पड़े डायरी, न रहना पड़े अकेले..


मैं नहीं जानता यह मेरे आखिरी शब्द हैं, या इस वर्ष के, मगर हैं आखिरी..  


― 31 दिसम्बर 2025 

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