दिन भर ऊबते ऊँघते गुस्से से अपना ही होंठ खाते बीत गया। कभी कभी मुझे चिढ़ होती है, और वह क्यूँ शुरू होती है पता नहीं कर पाता। कोई विशेष और बड़ी वजह नहीं होती कोई छोटी मूर्खता बहुत होती है चिढ़ के लिए। कभी कभी तो मुझे इस बात पर क्रोध फूट पड़ता है कि कोई फूल क्यूँ तोड़ता है। कल ऐसा ही हुआ था। ऐसा क्रोध अपने भीतर मैंने कई साल पहले महसूस किया था, हैपी ( चचेरे भाई) तब छोटे थे, वो मेरे आस पास साइकिल दौड़ा रहे थे। मैं थका हारा स्कूल से आया था और गाय के चारे पानी के प्रबंध में लग गया था, भूख और थकन की वजह से मन पहले ही जल रहा था, उस बीच उसकी शैतानी और बार बार मेरे कहने के बावजूद न रुकने की वजह से मुझे ऐसा क्रोध आया था कि मैं खड़े खड़े काँप रहा था और उसी क्रोध में मैंने उसे इतना कसकर थप्पड़ मारा था कि साइकिल से गिर पड़ा। क्रोध शांत हुआ तो दिनों तक पछतावा रहा। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं मना कर रहा था कि फूल मत छुओ वो उसे मसल गए, मैं इतना क्रोध में था कि अगर वो मित्र न होते तो मेरी अंगुलियां उनके गाल पर छपी होतीं, उस क्रोध के बाद मुझे बहुत सी घटनाएं याद हो आईं, बहुत से दिन याद आए, अप...