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कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

एक समय हम जिस स्वभाव के लिए सराहे जाते हैं एक समय के बाद वही स्वभाव काटने लगता है। औरों को जो लगता हो लगता ही होगा ख़ुद को भी आभास होने लगता है कि हम उन जगहों पर अनाधिकृत प्रवेश कर रहें हैं जहाँ सीमित रहना था, बस विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति के लिए भावनाएं असीमित हो, अपने को भूल जाने का बल अधिक हो, अपनी हर इच्छा से पहले उसकी इच्छा की परवाह हो , वहाँ सीमित कैसे रहा जाए, कैसे खुद को सिकोड़ लिया जाए कि किसी को हमारे होने भर की भनक न लगे, कहते हैं आदमी जब दफनाया जाता 6 फिट जमीन लेता है, मैं जीते जी उतने में ही कैद हूँ। अपनी ही भावनाओं पर शर्मिंदा होता हूं, उस भावना पर जिसपर ख़ुश होना चाहिए था, खुला हुआ और जोते खेत की भूर-भूरी मिट्टी का रास्ता बनने की चाह और प्रयास में कब मैं कँटीला बाड़ा बनता चला गया, मुझे समझ ही नहीं आया।  जैसे जैसे मैं दुनिया को देख रहा हूँ, जान रहा हूँ, मुझे यह समझ आ रहा है कि जानना खोने का पहला चरण है। हर आदमी के भीतर वह आदमी है जो उस आदमी के अंदर नहीं होना चाहिए। यह जानते हुए भी कि क्या हमारे लिए ठीक नहीं है आदमी कर रहा है क्योंकि इसमें उसे किक मिल रही है,...

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हैं हम

भीतर अजीब सी उथलपुथल है। मन एक पल को सामान्य नहीं है। कल एक परीक्षा थी। उसके एक दिन पहले से ही मन जैसे बस बैठा जा रहा है। कहने को इतना कुछ है मगर उन्हें कह देना ठीक नहीं है। कल रात मैं देर तक सोच रहा था कि आख़िरी बार कब किसने मुझसे मेरी मर्जी पूछी, शायद किसी ने नहीं, हम योजना में होते होते कब बाहर हो जाता हूँ मुझे खुद पता नहीं चलता। खैर !.. छोड़ देते हैं जैसे सबके बीच मैं छूट जाता हूँ। सुबह बहुत जल्दी उठ गया था कहूँ या कहूँ रातभर नींद ही नहीं आई। सेंटर बगल ही था तो थोड़ा आराम से निकला, बाइक आधे रास्ते में बन्द हो गई, मैं लगातार प्रयास करता रहा मगर स्टार्ट न हुई, न जाने क्यूँ पहले कभी ऐसा होता नहीं था.. थोड़ी दूर पैदल लेकर चला, पैर की चोट से चला नहीं जा रहा था, खून आने लगा तो पसीने से लथपथ हुए वहीं रुक गया, बगल एक दुकान दिखी मगर सुबह 8 बजे कौन मोटरसाइकिल बनाता है, मैं निरीह सा खड़ा रहा, बगल एक बुजुर्ग ने पान की दुकान खोली थी, मुझसे पूछे क्या हुआ बच्चा ? मैं बोला, गाड़ी बन्द हो गई है बाबा चल नहीं रही है परीक्षा देने जाना था, तो बोले चाभी मुझे दे दो, चले जाओ , मैं मिस्त्री क...

अनुस्यूत

आह और कराह के स्वरों में ध्वनि नहीं होती है। ये बिना ध्वनि के एक अदृश्य तरंग की तरह कम्पित करते चलते हैं। यह जहाँ टकराते हैं गहरा घाव करते हैं, गहरा इस अर्थ में कि इनका कोई रूप तो होता नहीं कि कहा जा सके फलाँ व्यक्ति की आह से इतनी चोट लगी, या उसकी कराह की तीव्रता इतनी थी कि मेरा दिल फलाँ इंच या फलाँ सेंटीमीटर पसीज गया।  हमारी संवेदना व्यक्ति बद्ध होती है। उसे चोट बीमारी या कोई तकलीफ से फ़र्क तभी पड़ता है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति को हो जिसकी वजह से हमारी दिनचर्या प्रभावित होती है।  ********* न जाने किसने कहाँ कहा है कि ' जो हमारे बिना रह सकते हैं, उन्हें हमारे बिना ही रहना चाहिए ' ये वाक्य बीते महीने में मुझे लगातार रह रह कर याद आता रहा।  ******** हम सबसे सच्चे प्रेम में होते हैं, और झूठ भी प्रेम में ही प्रेम के लिए बोलते हैं। मैंने बहुत झूठ बोले हैं। मुझे उसपर कोई पछतावा नहीं होता, मौका मिला तो भविष्य में और बोलूँगा बोलता रहूँगा। मगर अपने प्रिय से नहीं, प्रिय के साथ रहने के लिए और तमाम दुनिया से... झूठी दुनिया से झूठ बोलने के क्या ही दिक्कत है।  ********** अगर आप यह देखन...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

द्वंद्व ही द्वंद्व का उत्तर है।

मन बड़ा व्यसनी है। मन धूर्त है। मन बहानेबाज है। मन सहारा ख़ोजता है। मन बिल्कुल उस आदमी की तरह है जो बैठते ही आधा लेट जाने का प्रयास करता है। यह सब वाक्य मेरे नहीं हैं मेरे पिताजी के हैं। परसों की रात फोन करके रोने लगे। उन्हें मेरी याद आ रही थी। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ रही है ( यह लिखते हुए मुझे इतना डर लग रहा है कि मेरी आँख भरी हुई है। बाईँ आँख ) वो और भावुक होते जा रहे हैं। मैं उनका सेम टू सेम कॉपी हूँ। लगभग वही स्वभाव है बस वो ज्यादा कामकाजी और दृढ़निश्चयी आदमी हैं, मैं नहीं, मैं आलसी हूँ। मैंने बिना बताए बस पकड़ा और उनके सामने खड़ा हो गया अगले कुछ घण्टे बाद, मुझे देखते ही भईया बोलकर सीने से कस लिया और रोने लगे, पूछ रहें हैं उसे क्यूँ नहीं लाए, मैंने कारण बताया, बैठे, मुझे ऐसे दुलारते रहे जैसे गाय अपने नवजात बच्चे को दुलारती हैं, मैंने फोन किया और पकड़ा दिया, पापा मुश्किल से दो शब्द बोले होंगे और फिर रो पड़े, उनकी आँखों में ऐसे आसूँ मैंने बाबा के मरने पर देखा था। जब वो दालान वाले कमरे के दरवाजे का एक पल्ला पकड़ कर बस फफक फफक कर रो रहे थे। आदित्य की मृत्यु पर तो जैसे पत्थर हो गए थे...

स्मृति

दिन !  एक के बाद अनेक दिन बीतते जाते हैं और हम सिकुड़ते जाते हैं। हम एक दिन इतना सिकुड़ जाते हैं कि थोड़ा और सिकुड़ने की इच्छा से टूट जाते हैं। हम आप टूटते हैं। आप ही जुड़ते हैं।  जब हम एक याद सहेजते हैं तो कई कई और यादों को भी एक साथ सहेज रहे होते हैं। उन्हीं कई कई यादों में से हम किसी एक याद के बने होते हैं। हमारी काया अनगिन यादों की कर्जदार है।  लिखा हुआ कुछ कितना अलौकिक होता है कितना सच्चा। कुछ शब्द छू रहा था और रो रहा था। कई बार वह बताया नहीं जा सकता जो महसूस होता है। ऐसा ही कुछ .. आज मन स्मृतियों में ही टहलता रहा।  गौरी और कृधा के साथ खेला कुछ देर..दोपहर बाद से स्मृतियों से दो दो हाथ कर रहा हूँ।  हिम्मत नहीं है कुछ अब । आज इतना ही। सब ठीक है।  मैं समझ नहीं पाता कभी कभी रो लेने के बाद जितना खालीपन और शांति लगती है, कभी कभी उससे उलट मन भारी हो जाता है। क्यूँ ..?  ― 21 मार्च 2025 / 8: 20 शाम 

दिन विषयक

मैं इतना गुस्सा क्यूँ करता हूँ ? किस बात की चिढ़ है मुझमें ? यह मुझे क्यूँ नहीं स्वीकार होता है कि जिसे मैं अपना सबसे करीबी मानता हूँ उसका कोई और करीबी हो सकता है। उसकी योजनाओं में नहीं भी हो सकता हूँ मैं। मैं कहीं नहीं हो सकता..मैं क्यूँ चाहता हूँ कि वो बस मुझे महत्वपूर्ण माने.. यह गलत बात है।  मैं कभी कभी बातचीत के दौरान ऐसे शब्दयुग्म इस्तेमाल कर जाता हूँ जिसके लिए फिर महीनों पछतावा होता है। मैं नहीं समझ पा रहा ऐसा क्यूँ हो रहा है। मैं जानता हूँ आसावधानी से बोला गया एक शब्द हमारी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। बहुत करीबी का भी मन दुखा देता है, फिर मैं क्यूँ नहीं छोड़ पा रहा हूँ इसे...  मुझे बहुत स्थिर और व्यवस्थित होने की जरूरत है। मुझे चुप रहने की जरूरत है। मैं कहीं दूर निकल जाना चाहता हूँ घूमने... मगर कैसे ? न जेब में धन है न साथ जाने वाले का मन  *************  रिश्ते ख़ालिस भावनात्मक होते हैं, वो मन से चलते हैं , वहाँ बुद्धि लगाने पर सब चौपट हो जाता है।  *************  कल रात नींद नहीं आई। आँसू रह रह कर आते रहे। बीते दिनों की याद आती रही, पिछले वर्ष...

साफ पानी की तलाश

गर्भ जब मां के पेट से बाहर इस दुनिया की तरफ बढ़ता है तो सबसे ज्यादा और सबसे पहले उसे जो शब्द सुनाई पड़ते हैं वह जीवन भर उन्हीं शब्दों का अनुकरण करता रहता है.... हम सब खुद को थोड़ा सा और जोर लगाते, धकियाते बढ़ते रहते हैं उम्रभर। न जाने बढ़ते रहते हैं या घटते रहते हैं। यह भी अजीब प्रश्न है, मगर यह तो प्रश्न। इस प्रश्न के प्रतिउत्तर में जितने भी तर्क हैं, सब कुतर्क हैं।  ***********  मन को मन जैसा महसूस करने के लिए मन का कुछ कुछ होते रहना जरूरी है। बिना बारिश के धरती भी पानी देना बंद कर देती है।  ************ सुबह आंख खुलते से धूल और गंदगी से लिपटा रहा, फिर भी सब साफ़ नहीं हुआ, सब कुछ है ही इतना गंदा की जिससे साफ करना चाहते हैं वही गन्दा हो जाता है। फिर साफ से गन्दा हुए को साफ करना पड़ता है। और फिर वही..   जबसे गाड़ी ली है पहली बार वह इतने दिन बन्द खड़ी थी, धूल और गंदगी से सनी हुई, अपने को धुलने से पहले उसे धुला, फिर स्टार्ट करते रहा न स्टार्ट हुई, शायद नाराज़ हो गई थी कि मैं तो तुम्हारे लिए हर कदम खड़ी रही, फटे टायर भी घसीटा तो चली, तुम मुझे छोड़कर चले गए, माफ़ी माँगा, साफ सफा...

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

अलग अलग जीवों के लिए आक्सीजन भी अलग अलग ही होता है यह मैं धीरे धीरे महसूस कर पाया, बेहतर तरीके से तब जान पाया जब उसके छू लेने भर से अपने भीतर की उदासी को बिलाते देखा, एक कमरे को भरे पूरे घर की तरह महसूस किया। प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका की उपस्थिति ही प्राणवायु होती है क्या है कहना अनुचित है ? ******** नींद फिर वैसी ही आँख मिचौली करने लगी है। रात सपनों से भरी रहती है, कैसे सपने ? यह बेहद निजी बात है, इसे केवल वही जान सकती है।  सुबह से दो अजीबोगरीब घटनाएं हुईं। व्हाट्सएप पर एक अंजान नम्बर से लगातार 4 बार कॉल आया, फोन मुझसे यूँ भी एक बार मे उठता नहीं, सो उठाया नहीं, घण्टे भर बाद मन हुआ कि देखूँ वह अन्जान नम्बर किसका है तो प्रोफ़ाइल पर एक खाकी वर्दी पहने अधेड़ उम्र व्यक्ति की तस्वीर लगी थी, मुझे ढेरों मैसेज भेजे थे, जिसमें मैं किसी से वासना भरी बात कर रहा हूँ ऐसा कुछ मामला था, नीचे एक धमकी भी थी, आपको 2 दिन में हेरासमेन्ट के केस में गिरफ्तार करना है, फोन कीजिए.. मैं देर तक देखता रहा सोचता रहा ऐसी बात तो मैं अपनी प्रेमिका से कभी बहुत निजी क्षण में भी नहीं कहता, न कह पाउँगा। अ...

फिर वही रात है .. रात है ख़्वाब सी..

ऊब जैसा कुछ कुछ भीतर होता रहा। हावी नहीं हुआ। अकेलापन नहीं महसूस हुआ। हुआ भी तो एक उम्मीद ने उस पर काबू रखा। अपने को अपने वश में करके जीने का जतन करता रहा। आधा सफल हुआ। रात बीतते बीतते मन भर रोया। हल्का हुआ। तो ख़्याल आया एक और साल अब मुँह बाए सामने खड़ा है यह कहने को कि अभी तक कुछ नहीं कर पाए ? हद है तुम नकारा ही रहे !  अब मन को दबाना सीख गया हूँ। दबाया और कुछ घड़ी निराला को पढ़ता रहा। मैं निराला और शमशेर की शाब्दिक गोंद में जाकर ही मानसिक मार से बच लेता हूँ।  ********** कल रात नितीश भईया से बात हो रही थी, उन्होंने कई जरूरी मुद्दों पर बात की। कुछ ऐसे भी जिनपर खुलकर बात करना क्या सोचने तक पर पाबंदी है। यौन इच्छाओं का दबाव, स्पेस की कमी, लड़कियों के मन में जबरन का भरा हुआ सुचिता का विचार, जबकि वह हमारी मूल प्रकृति है, हम अपनी प्रकृति से हटते जा रहें हैं इसीलिए मनुष्य होने से भी चूकते जा रहें हैं। सेक्स बहुत सामान्य सी आवश्यकता है जिसकी पूर्ति भर की छूट, उतना स्पेस, हमें बनना होगा। सम्भवतः हमारी संताने इस मामले के अच्छा समाज पाएंगी, हम उन्हें खुलकर जीते देखना चाहते हैं। म...

स्वसंवाद

सुंदर सपने को एक बार और देख लेने की चाहत बड़ी अजीब होती है। हम उस मोह में टूटी नींद के बाद फिर नींद लाने का लाख जतन करते हैं पर आती नहीं। आ भी जाती है तो वह सपना नहीं आता जिसके लिए नींद को मनाया जा रहा होता है। एक बार उठा, फिर लेट गया। सुबह देर तक बिस्तर में पड़ा रहा, मगर... टूटे हुए सपने और भविष्य के नाम टाल दी गयी योजनाएं बड़े किस्मत वालों की ही पूरी होतीं हैं। हर दिन की अपनी मजबूरी होती है, और हर नए दिन की अलग आवश्यकता, अलग इच्छा है। प्रयास करो चीजें टालो नहीं, जब जो मन करे जी लो..'अगले पल' जैसे शब्द के चक्कर में मत जिओ।  *********** मन कुछ अनमना सा था थोड़ी देर प्रश्नों से जूझता रहा फिर लगा खोपड़ी आँख से टपक जाएगी तो सब समेट कर लेट गया। थोड़ी देर लेटने के बाद बाबा की एक बात याद आयी और उठ बैठा, वो जो बात याद आई वो बात वही थी जो सबके बाबा या पिताजी सबको कहते हैं। अरे भई वही 'दिन में सोना बीमारी का घर' , उठा तो इधर उधर कुछ घड़ी चलता रहा, फिर मन में आया, बिखरी चीजों को सही कर देते हैं। शुरू हुआ तो पहले पहल हर कोने से, बिस्तर के नीचे से सिक्के निकले उन्हें गुल्लक में भरा, पापा ...