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कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

एक समय हम जिस स्वभाव के लिए सराहे जाते हैं एक समय के बाद वही स्वभाव काटने लगता है। औरों को जो लगता हो लगता ही होगा ख़ुद को भी आभास होने लगता है कि हम उन जगहों पर अनाधिकृत प्रवेश कर रहें हैं जहाँ सीमित रहना था, बस विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति के लिए भावनाएं असीमित हो, अपने को भूल जाने का बल अधिक हो, अपनी हर इच्छा से पहले उसकी इच्छा की परवाह हो , वहाँ सीमित कैसे रहा जाए, कैसे खुद को सिकोड़ लिया जाए कि किसी को हमारे होने भर की भनक न लगे, कहते हैं आदमी जब दफनाया जाता 6 फिट जमीन लेता है, मैं जीते जी उतने में ही कैद हूँ। अपनी ही भावनाओं पर शर्मिंदा होता हूं, उस भावना पर जिसपर ख़ुश होना चाहिए था, खुला हुआ और जोते खेत की भूर-भूरी मिट्टी का रास्ता बनने की चाह और प्रयास में कब मैं कँटीला बाड़ा बनता चला गया, मुझे समझ ही नहीं आया। 

जैसे जैसे मैं दुनिया को देख रहा हूँ, जान रहा हूँ, मुझे यह समझ आ रहा है कि जानना खोने का पहला चरण है। हर आदमी के भीतर वह आदमी है जो उस आदमी के अंदर नहीं होना चाहिए। यह जानते हुए भी कि क्या हमारे लिए ठीक नहीं है आदमी कर रहा है क्योंकि इसमें उसे किक मिल रही है, उसे लग रहा है असली ज़िंदगी जीना ज़िंदगी से बाहर जाकर जीने में है, जबकि सच इससे बिल्कुल पलट है, दायरे में रहकर जीना ही सुंदर जीने का तरीका है। जैसे मोटा होना स्वस्थ होने का मानक नहीं है वैसे ही फैली हुई और जो मन आए कर लेना अच्छी ज़िंदगी जीना नहीं है। 

लोग जिस तरह से हर दूसरे आदमी का दोहन कर लेने पर आमादा हैं यह बहुत देर में और खासकर तो तब समझ आता है जब हमारे देह से रक्त का आखिरी कतरा भी खींच लेते हैं और कहते हैं 'अरे तुम बहुत सही हो..तुम्हें लोग समझ नहीं रहें हैं' यह मीठे वाक्य में लिपटा जहर है। 

सच के कई चेहरे होते हैं, जब बार बार कुरेदने के बाद भी वह सुनने को नहीं मिलता जो सच है तो उसी सच को सच मान लेना चाहिए जो आपको दिखाया गया है, अपने देखे को अपनी आंख में दफन कर लेना ही भला होता है।

प्रेम व्याकुल होता है प्रेम तटस्थ हो ही नहीं सकता। प्रेम में हमारी हँसी खुशी उत्साह सब एक व्यक्ति से होता है, उसके बिना जीवन सारहीन और निरुद्देश्य लगता है। हम उस उद्विग्नता में परेशान होते हैं , एक अंतराल पर बात करना, बात न करना, अचानक हँस पड़ना तक हमें दुनिया के अन्य लोगों से अलग महसूस होता है, प्रेम लगातार बनी रहने वाली तड़प का नाम है। प्रेम हमें पहले उदार बनाता है, इतना उदार की कोई खाल भी खींचे तो हमें उसका हाथ देखने का मन होता है कि उसे ज्यादा ताकत तो नहीं लगानी पड़ी। प्रेम हो या जीवन, यह सुखद तभी हो सकता है जब हम अपनी आत्मा को इतना फैला लें कि उसमें सब नरात्मक चीजें आकर सकारात्मक हो जाएं। वह जो दिख रहा है को नहीं वह जो कह रहा है उसे ही शाश्वत सत्य मान लो,  प्रेम में समंदर नहीं नदी बनने की जरूरत होती है जहाँ हमारा प्रेमी पानी भी पी सके और कूड़ा भी फेंक सके। 

धीरे धीरे मेरा लिखा ही मेरे गले की फांस बनता जा रहा है। मैं किसी दिन अपना गला घोंटकर मरूँगा। यूँ भी मैं लगभग हर दिन ... 

जीने की तमाम इच्छा जिनसे जुड़ती हैं जब उन्हें ही हमारी इच्छा पर संदेह होने लगे तो वह तमाम त्याग एक क्षण में राख हो जाते हैं जिन्हें हमने कोयले की तरह गाढ़े दिनों के लिए सम्भाल कर रखा था। 

मन का कुछ भी नहीं है। मन भी नहीं। ऐसे ऐसे वाक्य सुनने मिलते हैं जिनकी कल्पना नहीं की थी कभी। कुछ कुछ शब्द मन मस्तिष्क में घूमते रहते हैं वो स्थिर ही नहीं होते। गहरे दुःख में आँसू नहीं आते, हम बस एकटक देखते हैं। 

अच्छी बातें हमें अच्छे समय में कभी समझ नहीं आतीं।

बीते हफ्ते भर से आज कुछ शारीरिक तौर पर आराम मिला। लगभग कामों की इति हुई, मगर अभी भी इतना बचा है कि.. ख़ैर! धान की नर्सरी लग गई, खेत में जितना पानी गया होगा मेरी आँखों से उतना ही बहा होगा, परिवार जब दूर हो तो मन एक पल को सुकून में नहीं होता है, आप अपने परिवार को जानते हैं सबको नहीं, कब किसके भीतर का आदमी मर जाए और वो शैतान हो जाए पता नहीं। 

दरअसल हम जब अपने करीबी से पूछते हैं वो कहाँ है, कैसे है, कब तक घर जाएगा, हम यह जानना चाह रहे होते हैं कि अभी उसके आसपास कितनी मनुष्यता बची है, क्या अभी भी सम्बन्धों की मर्यादा बची हुई है या नहीं, उसे कैसे लग रही है दुनिया.. हम संदेह वश नहीं परवाह वश पूछते हैं। बस अजीब यह है यह उस क्षण बंधन लगता है इसका अंतर और इसकी खूबसूरती तब समझ आती है जब पूछने वाले के नाम के आगे स्वर्गीय लग चुका होता है।

जैसे हम सब बचपन में अपने बाबा से नफरत सी करते थे, वो न हमें साइकिल चलाने देते, न बाहर धूप में टहलने देते, न कहीं अकेले जाने देते, रूटीन में रखते एकदम, बड़े भईया लोग तो कई बार ऐसी ऐसी योजना बनाते की अब सोचकर शर्मिंदगी होती है, अब जब वो नहीं हैं हम उन सब बातों के अर्थ समझ आते हैं, हमारे पास से वो दीवार वह पेड़ चला गया जो हमें खुलेपन और छाँव का अर्थ समझाता था। 

अखबार में ऐसी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं ऐसी ऐसी वारदात की कलेजा काँप जाता है, कोई आपके आसपास का ही कब हैवान बन जाए कुछ पता नहीं है। माँ जब अपनी बेटी को नहीं देख पा रही हैं तो और किसको क्या ही कहा जाए। 

कल खेत की मेड़ पर एक गिलहरी मरी हुई पड़ी हुई थी, शायद किसी बड़े जानवर ने सांप ने काटा था, उसके पेट पर खून के धब्बे थे। मैंने उसे फावड़े से सहजता से उठाकर आम के पेड़ के नीचे मिट्टी को सौंप दिया, और प्रार्थना कि ये प्रकृति उसे जो बनना हो बनना इंसान न बनना, इंसान बनाने का मन ही हो तो संवेदनशील मन नहीं देना, क्रूर लापरवाह और बिल्कुल बदतमीज बनाना, स्त्री तो बिल्कुल नहीं बनाना।  

भीतर जैसे खून दौड़ता है वैसे ही एक याद दौड़ती रहती है, कितने जतन के बाद भी मिलना सम्भव नहीं हो पा रहा है कल से फिर नयी दौड़ है.. इतंज़ार नाम के प्लेटफार्म पर जाने कब वह उतरेगी जिसे देखकर मैं कह पाउँगा कि मैं ज़िंदा हूँ, और जो सोच पाएगी की मैं उस पर भरोसा नहीं करता जो यहाँ आकर खड़ा हूँ।

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