जब भी स्थिर होकर बैठता हूँ, तो सबसे पहले स्थिरता के विषय में ही सोचता हूँ, जैसे अकेले होने पर अकेले न होने के विषय में सोचता हूँ। स्थिरता के विषय में सोचते हुए पाता हूँ कि स्थिरता का ख़्याल ही मुझे अ-स्थिर किए हुए है। "मैं क्या हूँ" का ख़्याल मुझे लगातार इतना घेरे रहता है कि "मैं जो हूँ" उसे महसूस ही नहीं कर पाता हूँ। खेत, खलिहान, ताल-तलैया, घर, बाज़ार, बगिया और जंगल भटकते हुए जो कुछ खोजता रहता हूँ, वह कहीं है ही नहीं और वह क्या है, यह भी नहीं जानता हूँ। मैं इतना अजीब हूँ कि अपनी अजीबियत के विषय में जानते हुए भी सब वैसा ही करता जाता हूँ। धान की चार बालियाँ नोचकर उन्हें मसला, तो उनसे चावल नहीं, दूध सा तरल निकला और इतने में ही मुझे एक ग्लानि ने घेर लिया। मैं बार-बार अपने से यह प्रश्न करता रहा कि तनिक और प्रतीक्षा क्यों नहीं कर सकता था? जबकि मैं जानता हूँ कि मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ, प्रतीक्षा करना ही ऐसी कला है जिसमें मुझे महारत हासिल है। जान लेने की जल्दी में हम कितना कुछ खो देते हैं! कितने अरब प्राण केवल इसलिए ले लिए गए कि प्राण न जाने पाएँ! यह सब कितना...
आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा। मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं। इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...