सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

hindi writing लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग्लानियों के शव पर तांडव

जब भी स्थिर होकर बैठता हूँ, तो सबसे पहले स्थिरता के विषय में ही सोचता हूँ, जैसे अकेले होने पर अकेले न होने के विषय में सोचता हूँ। स्थिरता के विषय में सोचते हुए पाता हूँ कि स्थिरता का ख़्याल ही मुझे अ-स्थिर किए हुए है। "मैं क्या हूँ" का ख़्याल मुझे लगातार इतना घेरे रहता है कि "मैं जो हूँ" उसे महसूस ही नहीं कर पाता हूँ। खेत, खलिहान, ताल-तलैया, घर, बाज़ार, बगिया और जंगल भटकते हुए जो कुछ खोजता रहता हूँ, वह कहीं है ही नहीं और वह क्या है, यह भी नहीं जानता हूँ। मैं इतना अजीब हूँ कि अपनी अजीबियत के विषय में जानते हुए भी सब वैसा ही करता जाता हूँ। धान की चार बालियाँ नोचकर उन्हें मसला, तो उनसे चावल नहीं, दूध सा तरल निकला और इतने में ही मुझे एक ग्लानि ने घेर लिया। मैं बार-बार अपने से यह प्रश्न करता रहा कि तनिक और प्रतीक्षा क्यों नहीं कर सकता था? जबकि मैं जानता हूँ कि मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ, प्रतीक्षा करना ही ऐसी कला है जिसमें मुझे महारत हासिल है। जान लेने की जल्दी में हम कितना कुछ खो देते हैं! कितने अरब प्राण केवल इसलिए ले लिए गए कि प्राण न जाने पाएँ! यह सब कितना...