सोचता हूँ नहीं बताऊंगा। नहीं बताने का एक ही तरीका है सामने न पड़ना या बात न करना। पर जैसे ही बात होती है सब बक बक बोल जाता हूँ। भूल जाता हूँ दूर बैठा व्यक्ति मुझसे पहले भी तमाम बातों से जूझ रहा होगा। मन या तो कहीं खुलता नहीं या जहाँ खुलता है वहाँ फिर झूठ नहीं बोल पाता।मैं तुम्हारे सामने तुम्हारे लिए निरावरण हूँ। तुम तय करो तुम्हें कैसे देखना है। देखना भी है या नहीं। दिन लगभग बिस्तर पर, जमीन पर घुरचते बीता। ऐसी दैहिक पीड़ा दिनों बाद नसीब हुई। काश यह बीमारी इतनी बढ़ती की मेरे पास चली आती तुम.. कोई न कोई तो तुम्हें सूचना दे ही देता। मैं न बुलाता तो भी। मैं बुलाने से डरता हूँ। नहीं आई तो .. ? ख़ैर ! एक स्कूल के दोस्त की बहन आईं थी। उन्हें बस तक छोड़ना पड़ा। आदर्श और बदर आए थे। कुछ इधर उधर की बातें हुई। चाय पिया गया। भईया आए थे दोपहर में तो खाना नसीब हो गया था। वो डाँट कर खिलाते हैं। कल रात से एक अजीब सी खलिस है सीने में उसके लिए शब्द नहीं है मगर है.. बहुत निजी है। कुछ पढ़ लिख नहीं पाया। अभी बैठा था तो अनुवाद वाला काम देखने का प्रयास कर रहा था। मन नहीं किया। डायरी खोलकर सोचा...