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आँसुओं की आवाज़

रौशनी की खूब व्यवस्था है, विकल्प ही विकल्प है, सूरज से ही काम नहीं चलाना है फिर भी अंधकार का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। इतनी किताबें, इतने नीतिपरक वचन, इतनी महनीय आत्माओं के संदेश उनका बलिदान आस्था के नाम पर ठगे जा रहे लोगों में रौशनी नहीं कर पा रहीं हैं। शासन प्रशासन या और सारे पुलिस बल भी लोगों की मदद बिना बेकार हैं। और लोग हैं कि उन्हें कुछ दिखता ही नहीं, उन्हें मरने की उत्सुकता है, आस्था का अहंकार है, सनातनी होने दिखावा करना है। कर्म लगभग के अच्छे नहीं हैं, हर दूसरा आदमी तीसरे को नोच लेना चाह रहा है लेकिन सबको लगता है यह सब पाप गन्दी मानसिकता गंगा धो देगी। वो कभी नहीं धोएगी। ऐसी आस्था, आस्था कम मूर्खता ज्यादा है जो लोगो हो तर्कहीन कर दे।  सोचने विचारने की क्षमता सोख ले। ऐसे मति वालों के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है, उनके लिए कुछ भी कर लो सब बेकार है, संत समाज भ्रष्टों से भर गया, वह अनर्गल प्रलाप करता है। अशिक्षित लोगों में रोष पैदा करता है, जिसके लिए करना चाहिए उसके लिए नहीं करता कुछ, वह चाहता है कि लोग उनके चरण वंदन करें, मूल बात से दूर रहें।  सरकार तो हमेशा से ऐसे मामलों ...