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वही जिसे कम सोचता हूँ ।

वो सभी लोग जिनके कई चेहरे थे, मैं उन सबको अपने एक चेहरे से देखने का आदी था। वो हर बार मुझे मूर्ख करार करते और निकल जाते। ज्यादातर उनके हर वाक्य के बाद मेरे पास विस्मयादिबोधक चिन्ह लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचता। उसके बाद मैं ख़ोजता रहता, काश कोई ऐसा वाक्य पकड़ में आता जिसके बाद मैं पूर्णविराम लगा पाता और अपने को कुछ और सोचने में प्रवृत्त कर पाउँ .. पर यह सम्भव ही नहीं हो पाता। मैं हमेशा पूर्णविराम की खोज में रहा पर मुझे हमेशा मिला विस्मयादिबोधक चिन्ह ! ******** क्या मैं हर जगह बस फेल होने के लिए बना हूँ ? दिलासे के अतिरिक्त कोई लॉजिकल जवाब है जिसके बाद मैं बस स्थिर हो उस जवाब को क्रियान्वित करने की तरफ बढ़ता और कुछ समय बाद जवाब देने वाले को कह पाता.. 'शुक्रिया आपके जवाब ने मुझे ढ़ेरों सवालों से बचा लिया' दरअसल है ही ऐसा एक सही उत्तर हज़ारों प्रश्नों से हमें बचा लेता है। जैसे अभी मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ वह ठीक ठीक नहीं मिल रहा है। जिस भी क्षण मिल जाएगा कलम ठहर जाएगी।  ******** हर दो लोग के बीच एक तीसरा आदमी है। जो पहले आदमी की असुरक्षा का कारण है। पहले आदमी की सोच मे...

आभास का अभ्यास

अकेले रहना हज़ार साँपों के बीच रहने जैसा है। सब कुछ है पर लगता है कुछ भी नहीं है। जिन चीजों के लिए उत्साह से भरा रहता था उनसब चीजों से विकर्षण और उब होती है। गुस्सा आता रहता है। सुबह उठकर घूमना शुरू कर दिया है। सही से खा पी रहा हूँ। सो भी जाता हूँ। पढ़ना भी हो रहा है। कुछ आर्थिक जरूरतों के लिए काम भी लिया है कर रहा हूँ। पर भीतर अजीब सी स्थिति रहती है। कुछ लिख नहीं पा रहा। दिन दिन भर कोई ऐसी आवाज से पाला नहीं पड़ता जिसके लिए जीवन जीना चाहता हूँ। सब मेरे लिए खड़े हैं। फिर भी न जाने क्या है जो बस है । शायद रचनात्मक बेचैनी इसे ही कहते हों। अगर मुझ जैसे कीड़े से आदमी में इतनी उथपुथल है तो जो रोज आदमियों को बना रहा, मार रहा है, दिन दिन अपना क्षरण देख कर भी सब दिए जा रहा है वह कितना बेचैन रहता होगा। ईश्वर बेचैनी का दूसरा नाम तो नहीं है ? उनकी पत्नियाँ उन्हें कैसे सही करती होंगी। उन्हें तो लगता हो न यह सब उनकी किसी कमी की वजह से है। यह सामान्य है हम जिससे प्यार करते हैं उसकी हर मानसिक स्थिति का दोषी खुद ही को मानने लगते हैं। हम बार बार पूछते हैं तुम ठीक तो हो न ? भले ही वो कुछ न बोले पर उस शांति को...

खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

फिसलन

कितना और कब तक किया जा सकता है एफर्ट ? कोई तो सीमा होती होगी या बस जीवन एफर्ट करते बीत जाएगा। मुझे बहुत की इच्छा नहीं है पर जितनी है उतनी तो मिले उसमें भी कम कर दिया जाएगा तो फिर बचेगा क्या ? फिर तो चाहिए ही नहीं। मैं बिल्कुल उसी ख़्याल का हूँ कि 'हम तो पूरा का पूरा लेंगे जीवन' अगर चाहिए तो सही से चाहिए वगरना चाहिए ही नहीं। हर चीज की थोड़ी थोड़ी आवश्यकता है, थोड़ी मन की, थोड़ी देह की, थोड़ी ही आत्मा की, जीवन की भी बहुत थोड़ी ही, उसमें समझौता नहीं कर पाऊंगा मैं,  कह दो नहीं मिलेगा मैं छोड़ दूँगा, पर यह तनिक नहीं मानता मैं की थोड़ा सा ले लो, थोड़ा सा ही तो चाहिए, थोड़े का थोड़ा क्या होता है कुछ भी नहीं.. पता नहीं क्या चाहता हूँ मगर जो कुछ चाहता हूँ वैसा ही चाहता हूं जैसा सोचता हूँ। पूर्ण ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और पूर्ण निष्ठा के साथ..  दिन इधर उधर करते, कुछ पढ़ते, कुछ लिखा हुआ ठीक करते बीता। सुबह से शाम तक एक बात नहीं लगातर बस चुप्पी। एक याद घेरे रही, मन करता रहा कि जाऊँ फिर सोचा नहीं, इंतज़ार कर लेते हैं, वो जब खुद आता है तो मन से आता है।  न जाने क्यूँ आज मुझे ख़ूब रोना आया। भीतर अजीब सा...

स्मृति

दिन !  एक के बाद अनेक दिन बीतते जाते हैं और हम सिकुड़ते जाते हैं। हम एक दिन इतना सिकुड़ जाते हैं कि थोड़ा और सिकुड़ने की इच्छा से टूट जाते हैं। हम आप टूटते हैं। आप ही जुड़ते हैं।  जब हम एक याद सहेजते हैं तो कई कई और यादों को भी एक साथ सहेज रहे होते हैं। उन्हीं कई कई यादों में से हम किसी एक याद के बने होते हैं। हमारी काया अनगिन यादों की कर्जदार है।  लिखा हुआ कुछ कितना अलौकिक होता है कितना सच्चा। कुछ शब्द छू रहा था और रो रहा था। कई बार वह बताया नहीं जा सकता जो महसूस होता है। ऐसा ही कुछ .. आज मन स्मृतियों में ही टहलता रहा।  गौरी और कृधा के साथ खेला कुछ देर..दोपहर बाद से स्मृतियों से दो दो हाथ कर रहा हूँ।  हिम्मत नहीं है कुछ अब । आज इतना ही। सब ठीक है।  मैं समझ नहीं पाता कभी कभी रो लेने के बाद जितना खालीपन और शांति लगती है, कभी कभी उससे उलट मन भारी हो जाता है। क्यूँ ..?  ― 21 मार्च 2025 / 8: 20 शाम 

जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

सुबह सुबह बारिश हुई। उठकर बाहर टहलता रहा। पेड़ पौधों पर जमी धूल साफ हुई। बौर धूल गए। हवा थोड़ी ठंडी हुई । मार्च ही में जो जून सा माहौल है कुछ हल्का हुआ। मैं देर तक बैठा रहा। राग रामकली सुनता रहा। मुझे बारिश बहुत पसंद है। न जाने क्यूँ  ख़ूब सूखे पत्ते गिरे हैं। अब उठता हूँ पर कोई है नहीं जिसे दे सकूँ। अपने आप को आप कुछ नहीं दे सकते सिवा दिलासा के।  एक कहानी पढ़ी अमरकांत की 'मौत का नगर' । जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि पर है। कथ्य अच्छा है, शिल्प भी अच्छा है पर कहानी कमजोर है। कुहासा कहानी पढ़ी है अमरकांत जी की और भी बीसियों कहानी पढ़ी है। अमरकांत जी के भीतर के कहानीकार का फ्लेक्चुएशन  होता रहता है । कभी कभी यूँ लगता है वह लिखने कुछ और बैठे थे लिख गयी कहानी, या उन्हें लग गया यह कहानी है तो उसे जहाँ लगा कामभर का हो गया वही छोड़ दिया। इनकी कहानी इंटरव्यू,  गले की जंजीर, ज़िंदगी और जोंक, फ़र्क, कबड्डी, यह अलग टेस्ट की कहानी हैं। ख़ैर ! मैं ग़लत हो सकता हूँ। मगर यह मेरा अपना अनुभव है।  दिन भर इधर उधर न जाने क्या किया। कुछ काम किया कुछ पढ़ा। साहित्य इतिहास के लगभग 30 पन्ने प...

रौंदे हुए फूल

मुझे कहीं जाना हो या किसी करीबी को कहीं से आना हो मुझे नींद नहीं लगती। लाख जतन कर लूं नहीं आती नींद। अनगिन कल्पनाओं से भरा रहता है मन।  एक पल को स्थिर नहीं होता। भीतर कल्पनाओं के भवन बनते ढहते रहते हैं। मैं उसी कशमकश में जागता रहता हूँ। मैं धीरे धीरे करके बहुत कुछ टालना सीख गया मगर अपने भीतर का यह कशमकश नहीं टाल पाता। यूँ लगता है जैसे कल्पना कोई नदी है, तेज बहती नदी, जिसके किनारे पर ही मेरा चप्पू टूट जाता है और मैं फिर अनियंत्रित बहता रहता हूँ। बहता रहा रात भर। सुबह 4 बजे मम्मी नाश्ता बनाईं। कमरे में सब समेटा और निकल पड़ा। खाली हाथ गया था । फिर भी लौटते हुए सामान हो गया डिक्की भरकर। सोना का पैर छूने गया तो वो अपना मुँह फैला ली आगे पैर की सीध में.. उन्हें जब प्यार आता है तो ऐसे ही करती हैं बचपन से।  इन दिनों लगता है जैसे शरीर ऊर्जाहीन होती जा रही है। पहले बाइक चलाने पर थकान नहीं लगती थी अब लगती है। कन्धा और रीढ़ की हड्डी लग रहा था निकल जाएगी। पर ठीक है। पहुँचा सबसे हालचाल लिया। धूल झाड़े। पुराने पड़े कपड़े कुछ कागज़ कुछ और स्मृति सब जला दिया। पता नहीं क्यूँ भी...

फिर वही रात है

वही दिनचर्या। वैसा ही दिन । वैसी ही रात। दिनभर झकोर चलता रहा। मन हिलता रहा। कभी कभी लगता है जैसे ज़िन्दगी लगातार हड़बड़ी के लिए मिली है यहाँ सहेजो समेटो वहाँ जाओ, वहाँ भी वही करो। कुछ भी न स्थिर है न स्थाई। देश की दशा और मन की दशा एक सी है। मन भी उच नीच पहले और बाद की लड़ाई लड़ता रहता है। बस खून बहता है सफेद खून परिणाम कुछ नहीं निकलता। निकलेगा भी नहीं। इन दिनों लगातार मेरे मन में चलता रहता है कि कैसे.. कुछ नहीं।  चना काट रहा था सबकी बड़ी याद आई..पापा दीदी बच्ची सबको हरा चना भूनकर खाना पसंद है।  मुझे अजीब चिड़चिड़ाहट हो रही है। मन कर रहा है कहीं खड़े होकर चीख लूँ बस ― 18 मार्च  2025 / 7: 40 शाम 

कहीं बे-ख़्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने

बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।  मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।  ***********  सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ ...

कुछ तो लोग कहेंगे.. लोगों का काम है कहना

पिछले 3 सालों से डायरी के पन्नों पर लगभग हिसाब ने जगह ले लिया है। कहीं किराने का हिसाब है कहीं फल सब्जी और मिठाइयों का कहीं किराए लिखे हैं कहीं मजदूरों का हिसाब है। दवाओं के नाम भरे हैं या तो हॉस्पिटल के बिलों कक जिक्र है। फोन का नोटपैड भी लगभग ऐसे ही है।  मेरे आसपास के कई लोग जब मुझसे कहते हैं अरे वो तो तुम्हारे साथ ही रहता था उसका ये हो गया, तुम्हारा कैसे नहीं हुआ। मैं कुछ नहीं कहता, हँसकर कहता हूँ मैं बहैलपन करता हूँ, इधर उधर बेवजह घूमता रहता हूँ।  वो लोग घर के सदस्यों के मरने बीमार होने तक पर खड़े नहीं होते, उनके भीतर आत्मसम्मान नहीं है कहीं किसी से कुछ भी मांगकर खा लेते हैं रह लेते हैं मैं नहीं रह पाता। मुझे इज्जत का जीवन चाहिए या तो नहीं चाहिए। मेरे अकेलेपन और फेलियर होने पर सवाल उठाने वाले लोगों को पहले अपने गिरेबान में देखना चाहिए। वो जिस उम्र में खेल खा रहे थे मैं परिवार देख रहा हूँ, बहनों के लिए रिश्ता खोज रहा हूँ। वो जिसे सफलता और ऊँचाई समझते हैं उसे मैं लात मार आया हूँ, मैंने अलग राह चुनी है, मैं इसके दुखों संघर्षों को झेलने के लिए तैयार हूँ। मेरा जीवन म...

उस तरफ जाने से पहले

हम भरे होते हैं कि अभी फलाँ व्यक्ति सामने पड़े तो बताऊं।  ढ़ेरों तर्क़ लगभग उतने ही सवाल जवाब लिए भीतर से बिल्कुल तने खड़े रहते हैं कि बस अबकी सब कह देंगे। अचानक उस चेहरे को देखते हैं जिसपर सिवा पसीजने के और कुछ किया ही नहीं जा सकता। हम बिल्कुल चौंक जाते हैं। हमें नहीं समझ आता यहाँ क्या करना है, कैसे पेश आना है। यह कितना अजीब है न कि हम दूर से कहीं की परिस्थितियों को बस सोच सकते हैं। किसी के मन को मनगढ़ंत सोच सकते हैं। सामने सब बिल्कुल अलग होता है। वास्तविकता से टकराते ही हमारे ख़्वाब के घर नींव सहित उखड़ जाते हैं। और हम असहाय हो खड़े हो जाते हैं। आम आदमी का हाल कुरुक्षेत्र में खड़े उस द्रोण की तरह है जो युधिष्ठिर के मुँह से 'नरो या कुंजरो' सुनकर अपना सब कहा सुना भूलकर हताश हो गया था। हम सब द्रोण ही हैं, हम सब एक अश्वत्थामा पाल रहें हैं।  ********** लगभग बातों पर मैं लगभग बचता रहता हूँ। जहाँ बहुत कुछ कहने की जरूरत होती है वहाँ कुछ कुछ कहकर बच लेता हूँ। रिश्तों को बचाए रखने के लिए कुछ घावों को रिसते रहने देना होता है और कुछ पर बकायदा मलहम पट्टी कर उसे ठीक कर देना होता है, यह...

मन दिमाग से नहीं चलता और न दिमाग मन से

दिमागी समझाइश पर इच्छाओं का भार इतना हो जाता है कि मन सारी सूझ बूझ सारी रोका टोकी भूल जाता है और मन उसी तरफ भागता है। वह फैंटसी नहीं है। वह वास्तविक जीवन है। जहाँ से फैंटसी का अर्थ है। रात बमुश्किल नींद आई। नींद आई तो सपने में अनगिनत साँप ने घेर लिया। तुम चीखती चिल्लाती रही। मुझे खींचती रही। मैं बचने का कोई जतन नहीं कर रहा है। मैं तुम्हारे भीतर अपने लिए प्रेम देखकर स्थिर हो गया था। मेरे भीतर से साँपों का डर चला गया था। अनन्तः तुम मुझे बचा ले गयी। साँप जैसे अचानक चलती राह में आए थे वैसे ही गायब हो गए। सब ख़ूब मोटे मोटे और खतरनाक थे। पर किसी ने काटा नहीं बस डराया, मैं डरा भी। तुममें अदम्य साहस है।  नींद खुल गयी। फिर घण्टे भर बिस्तर पर करवट बदलता रहा। फोन में कुछ तस्वीर देखी जो मन को तरल कर गए। एक चिट्ठी लिखी। भेजने की हिम्मत नहीं हुई। नहीं भेजा। 4 बजे बिस्तर छोड़ दिया। कुछ देर बालकनी में बैठा रहा। मच्छर टूट पड़े तो फिर लौट आया फ्रेश हुआ और किताब लेकर बैठ गया। 'टेबल लैम्प' पढ़कर खत्म किया। गीत चतुर्वेदी के गद्य में एक भीतरी लय है। जो और कम मिलती है। उनकी गद्य भाषा इतनी सरल...

चले जाने का चले जाना

'वो मिलकर चले गए' इस वाक्य में मिलने पर जोर दूँ या चले गए पर ? चले जाने से क्यूँ चला जाता है मिलने का सुख ? कौन छूटता है दो लोगों के मिलने पर और चले जाने पर ? मिलने आने वाला या मिलकर चले जाने वाला ? जो भी छूटता है वह कैसे रहता है अकेले ? मेरी तरह तो नहीं रहता, हर शय में उसे ही तलाशता हुआ। वही जो चला गया। जिसका जाना आने से पहले तय रहता है। जिसपर मेरा पूरा अधिकार है और कोई अधिकार नहीं। जिसे छू सकने का सामर्थ्य मुझमें आजतक नहीं, वो मुझे छुए इतना भाग्यशाली तो मैं हूँ नहीं। हम अधूरी इच्छा ही नहीं अधूरी छुवन से भी भरे हुए हैं। हम पर इतना दबाब है कि हम जब जब फटते हैं रो पड़ते हैं। हमारे ज्वालामुखी का केंद्र आँख है और लावा वह आसूँ जो उससे फूट पड़ता है। यह बेहद गर्म होते हैं। यह दुःख के आँसू होते हैं। दुःख के आँसू गर्म होते हैं। ग्लानि के ठण्डे।  इतने सालों में मैंने एक बात गौर की जब जब मुझे रोना आता है मेरी बाईं आँख से आसूँ पहले गिरता है दायीं आँख से बाद में। ऐसा क्यूँ पता नहीं । मगर ऐसा है। मेरे भीतर की स्त्री दाहिने क्यूँ नहीं होती। अब स्त्रियों को अपनी जगह बदल लेनी चाहिए व...

लगभग जीवन

मन किसी खंदक की खोह में घूमता रहा था सुबह से। रात की थकन पर अकेले पड़े रहने और अपने होने की व्यर्थता बोध ने परेशान रखा। एक याद सालती रही भीतर। दोपहर होते होते दिन खुला। मन ऐंठता रहा। यूनिवर्सिटी के गेट तक गया। लौट आया। मन कर रहा था बस कहीं पड़ा रहूँ। बाहर लईया चना खाता बैठा रहा। फिर कुछ दिन हुआ.. रौशनी लौटी। अब मेरी आँखों मे रौशनी है। ज़िंदा की तरह महसूस रहा हूँ। सब ठीक है। गीत चतुर्वेदी का 'लैम्प पोस्ट' पढ़ना शुरू किया है। 2 लेख पढ़ें हैं। अभी जीवन पढ़ रहा हूँ। पिताजी ऑफिस से थके हारे आएं थे। उन्हें माँ के स्वास्थ्य की चिंता है। मुझे दोनों की..  फिर आगे..  ― 3 मार्च 2025 / 9 : 15 शाम 

निरर्थक का अर्थ

यात्रा जारी है। यह मेरी यात्रा नहीं है। भविष्य के गर्त की ओर जाने की यात्रा है। मैं किसी गोल पिण्ड की तरह रफ़्तार में मौत नाम की खाई की तरफ लुढ़क रहा हूँ। तुम कहीं बीच में मिलोगी। फिर हम साथ लुढकेंगे। लुढ़कना रुकेगा नहीं ।  ************* बहुत ज्यादा सोचता हूँ पर बोलता हूँ बहुत कम। जब बहुत बोलता हूं तो बिल्कुल नहीं सोचता। बोलने के बाद सोचता हूँ ज्यादा तो नहीं बोल गया, फिर ख़ुद पर शर्मिंदा होता है , माफ़ी मांगता हूं। फिर तब तक चुप रहता हूँ जब तक अपने होने की याद बनी रहती है।  ************** सुबह उठते ही पाँव फोड़ लिया। हड़बड़ी मेरी मेरे लिए हर बार खतरनाक हुई। पिताजी को परेशान किया वो स्टेशन आकर खड़े थे। फिर बताया बस से आउंगा तो लौटकर गए। फिर आए घण्टे भर बाद। यह चोट से ज्यादा पीड़ादायक था। साथ जाने की बात थी अकेले गया। अकेले अकेले अकेले ही रहा। वर्तिका जी से मिला। कोई साहित्यिक बात नहीं हुई। पढ़ाई लिखाई नौकरी घर गाँव की चर्चा हुई। उनमें एक अजीब छटपटाहट है। न जाने कैसी। जैसे वह जानती नहीं उन्हें क्या करना चाहिए। लिखना ठीक है उनका। और ठीक हो सकता है। रवि के सत्कार ने मन मोह लिया। ...

मेरे वियोगी

आज महादेव के विवाह का दिन था। आज ही के दिन उनका प्रेम जीत गया था। महादेव से सुंदर कौन प्रेमी होगा। वो खुद को आरोपित नहीं करते, पार्वती के जीवन का अतिक्रमण नहीं करते। उनका जीवन गहन अंधकार में ज्योति का जीवन है। त्याग का जीवन है। प्रकृति के पूजक है, वहीं रहते हैं। जिनका कोई घर नहीं । खंडित को मंडित करते हैं महादेव। विष पीकर सुंदर बोलते हैं। उनमें पति होने का अधिकार कम है साथी और प्रेमी सा साथ खड़े होने वाला स्वभाव अधिक है। वो वियोगी हैं। रोते हैं। अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार हैं।  इस परंपरा को ध्यान से देखे तो सर्वत्र प्रेम की जीत की ही कथा है। प्रेम की ही स्थापना है। ईश्वर प्रेम के लिए लड़ते हैं।  अजीब यह है अब सब इतना विकृत हुआ है कि प्रेम करना ही गुनाह है। प्रेमी के लिए तड़पना मजाक की बात है। जाहिर करना तो इतना शर्मनाक है कि आप भरे समाज हाथ पकड़ लें तो लोगों की आँख तन जाती है। यह काश खत्म होता। दुनिया प्रेम से भर जाती। हर आदमी महादेव हो जाए हर स्त्री पार्वती। विवाह के नाम पर जो भी डर पैदा होता है वह खत्म हो, दोनों लिंगो में साथी मिलने का उत्स हो, लोग ईमानदार हों। कामन...

तारीख़ जल्दी क्यूँ नहीं पलटती ?

दिनचर्या वैसी ही थी जैसी कोई सुनना नहीं चाहता। तो छोड़ देते हैं। नया कुछ नहीं हुआ। वही दौड़भाग वही थकन। ऊब घेरे रहती है। न चाह कर भी रह रहा हूँ यहाँ... कहाँ होना चाहता हूँ ? यह भी नहीं पता। शायद पता भी है। कहूँगा तो विश्वास नहीं होगा, इतने लोग भरे हैं पर मैं अकेले हूँ। पिछले दस दिनों से स्थिर होकर उतनी ही देर बैठता हूँ जितनी देर डायरी लेकर बैठता हूँ। आसपास क़रीबी ही क़रीबी हैं मगर सब इतने दूर की किसी को यह तक खबर नहीं कि मैं.. हूँ या कहाँ से दौड़ कर आ रहा। बहने न हो तो मैं सम्भव है भीड़ की तरह गिन लिया जाऊँ। गलती मेरी भी है, मैं व्यवस्था करके हट लेता हूँ। ख़ैर... उम्मीद साली।  मैं कुछ दिन को कहीं भाग जाना चाहता हूँ। लिखते ही ख़्याल आ रहा है पिछले तीन साल से यह वाक्य सैकड़ों बार तो लिख बोल चुका होंउँगा ही। कुछ अर्थ निकला ? कुछ भी नहीं। वही मजबूरी। वही औपचारिकता। वही रोना । वैसा ही इंतज़ार। वैसा ही परिणाम। असफलता की जिल्द पर जिल्द चढ़ती जा रही है। जीवन लगभग यथावत है। क्या मैं प्रयास नहीं कर रहा ? अगर नहीं कर रहा तो फिर तकलीफ क्यूँ है ? कर तो रहा हूँ। मेरी हर मेहनत निष्फल होती जा रही है। सभी जतन...

अतीत दर्शन

आज 6 घण्टे से ज्यादा जाम में फंसा रहा। साथ गए ड्राइवर का जीवन बड़ा फिल्मी सा था। वो दो भाई तीन बहनें हैं। पिताजी माता और दादा के साथ परिवार में कुल आठ लोग थे। जमीन जायदाद थी। कुछ भैंसे थी। इनका परिवार खोआ बेंचा करता था। पड़ोस में दो घर मुस्लिम थे। उनके कुल नौ लड़के हुए, और उससे ज्यादा लड़कियां। सारे लड़के बड़े हुए तो इनकी जमीन जबरन कब्जा करने लगे जिससे रंजिश शुरू हुई। उस रंजिश में इनके दादा का देहांत हुआ, सर पर लट्ठ लगने से, पिताजी को गोली मारी गई, उनके बड़े भाई का गला काटा गया, माँ यह सब देखकर हृदयाघात से मर गई।  उस घटना के दौरान बहने और ये बुआ के घर गए थे जब यह सब हुआ। अब ये लोग घर से भागे रहते हैं। दो बहनों की शादी कर लिया है। एक बहन इंस्पेक्टर हो गई है। दूसरी पिछली साल बिहार में शिक्षक हुई। तीसरी पढ़ रही है। बिहार पुलिस हुआ था पर इनको छोड़कर वो जाने तैयार नहीं थी। ये नहीं पढ़े लिखे। जब यह सब घटना हुई थी तब ये 6वीं कक्षा में थे। बता रहे थे 8 साल पहले एक रात इन्होंने एक रिवाल्वर से उस घर के 3 सदस्यों की हत्या की और 2 लोग का गला रेत दिया। पुलिस इन्हें 2 साल खोजी, इनका इनकाउंटर ह...

नेपथ्य में सम्भावना

सब जगह होता हूँ और हर जगह छूट जाता हूँ। जिंदगी विनोद कुमार शुक्ल की कविता हो गई है। सारी जिंदगी पहले के ही कुछ सालों में थी। अब उस शुरू किए को पूरा करने की जदोजहद है। जदोजहद अधूरी रह जायेगी। जहाँ मन ऊब जाएगा वहीं मान लूँगा पूरी हो गई। अलग बात है पूरा कुछ भी नहीं।  जुकाम बुखार की तड़फ। उनींदी रात। गाय। दूध। कुछ पल को केश कर्तनालय। खरीदी। फिर. ननिहाल। भागवत। दिन भर बुखार रहा। दवा खाया। चलता रहा। शाम फिर वही। गाय चारा दूध। रात पिताजी आए। मम्मी वहीं हैं तो घर उन्हें काटने दौड़ रहा था। कह रहे थे उनके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं घर तो बहुत छोटी चीज़ है। लेकर गया वही। सबसे मिले। नाना पापा को गले लगाकर रोए। नानी भी। मना करते रहने के बाद मामी लोग पाँव धुलीं। थोड़ी देर टहल घूम कर चले आए। हर दूसरी बात र तुम्हारा ज़िक्र होता है। मैं नेपथ्य में रहता हूँ। यूँ लगता है मेरे होने का अर्थ इतना है कि मैं तुम्हारा आदमी हूँ। सब परिवार इकट्ठा था । मामा अपनी बहनों को पा फूले नहीं समाते। नाना नानी अपना परिवार इकट्ठा देख कुछ कुछ देर पर भावुक हो जाते हैं। नाना बड़े नाजुक मन के हैं। मैं दिखता रहूँ तभी उ...

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं

दो बहुत सख़्त चीजें नहीं जुड़ती हैं। बहुत सख़्त को जोड़ने के लिए बहुत नरम करना पड़ता है। इतना नरम की लगभग पिघलने की अवस्था तक पहुँच जाए। पिघलने की अवस्था तक ही पहुँचे, बहने तक नहीं। फिर उन दोनों पिघली हुई चीजों को एक साथ अपनी तमाम चीजों को छोड़कर एक दूसरे में मिलना होता है, मिल जाने के बाद फिर धीरे धीरे अपनी नरमाहट को कठोरता में परिवर्तित करना होता है। क्योंकि लगातार पिघलने की अवस्था में रहने पर पिघलना, बहने में बदल जाता है। रिश्ते भी ऐसे ही जुड़ते हैं। हम बहुत नरम होकर जुड़ते हैं फिर जुड़ जाने के बाद जब अपनी और अपनी अवस्था के साथ साम्य नहीं बनाते तो टूट जाते हैं। जैसे जैसे समय बीतता है, स्वभाव भी बदलता है। यह स्वाभाविक है। इसे हँसकर स्वीकार करना होता है। अन्यथा फिर रिश्ते टूट जाते हैं। तोड़ने के लिए नरम नहीं करना पड़ता।  दो लोगों के बीच अपनी अलग किस्म की केमेस्ट्री होती है। वह किसी दूसरे दो लोगों की तरह नहीं हो सकती, वहाँ तुलना दो लोगों में भेद पैदा करता है। साथी बनने के लिए अपने मन से ज्यादा अपने साथी के मन से चलना होता है। उसके मन से चलकर ही रिश्ता सुंदर होता है। जरूरी बात है क...