दो बहुत सख़्त चीजें नहीं जुड़ती हैं। बहुत सख़्त को जोड़ने के लिए बहुत नरम करना पड़ता है। इतना नरम की लगभग पिघलने की अवस्था तक पहुँच जाए। पिघलने की अवस्था तक ही पहुँचे, बहने तक नहीं। फिर उन दोनों पिघली हुई चीजों को एक साथ अपनी तमाम चीजों को छोड़कर एक दूसरे में मिलना होता है, मिल जाने के बाद फिर धीरे धीरे अपनी नरमाहट को कठोरता में परिवर्तित करना होता है। क्योंकि लगातार पिघलने की अवस्था में रहने पर पिघलना, बहने में बदल जाता है। रिश्ते भी ऐसे ही जुड़ते हैं। हम बहुत नरम होकर जुड़ते हैं फिर जुड़ जाने के बाद जब अपनी और अपनी अवस्था के साथ साम्य नहीं बनाते तो टूट जाते हैं। जैसे जैसे समय बीतता है, स्वभाव भी बदलता है। यह स्वाभाविक है। इसे हँसकर स्वीकार करना होता है। अन्यथा फिर रिश्ते टूट जाते हैं। तोड़ने के लिए नरम नहीं करना पड़ता।
दो लोगों के बीच अपनी अलग किस्म की केमेस्ट्री होती है। वह किसी दूसरे दो लोगों की तरह नहीं हो सकती, वहाँ तुलना दो लोगों में भेद पैदा करता है। साथी बनने के लिए अपने मन से ज्यादा अपने साथी के मन से चलना होता है। उसके मन से चलकर ही रिश्ता सुंदर होता है। जरूरी बात है कि यह विचार दोनों में हो । किसी एक में यह अगर भरा होगा और दूसरे में खाली होगा तो यह ठीक नहीं। दोनों में बराबर न हो तो इतना तो जरूर हो कि कोई एक अगर तिहाई भी दूसरे में पलटे तो दोनों पूरे भर जाएँ।
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तुम्हारी....
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जुकाम हो गया है। मन कर रहा है बस 'कोई' बैठ जाए मेरे बगल। कल रात भर शरीर में अजीब सी ऐठन रही। नींद बमुश्किल आई। जुकाम में बड़ी गझिन पीड़ा होती है। न कहने लायक न दिखाने..पर ठीक है।
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कल 20 तारीख़ थी। कुछ दिनों की तरफ लौटा, तो यह दिन सीने में कांटे की तरह चुभे। इंतज़ार शब्द अचानक से किसी तीर की तरह लगा , उंगलियों पर दिन गिना , कैलेंडर में लगे कुछ नोटिफिकेशन देखे। कई तारीखों से बस इंतज़ार.. फिर जब मिलना भी तो न जाने मिलने जैसा कुछ समय भी होगा या ... जो भी हो।
मुझे .. .. नहीं !
कर लेंगे इंतज़ार। जो लिखा है वो तो होगा ही।
मन कर रहा है कैसे बस चला आऊँ और सुब्ह बस पर बैठने तक साथ... फिर लगता है कहीं.. !
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आज शाम को जब रोटी बना रहा था तो जगजीत साहब गा रहे थे ;
' कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं'
यही मानना है। जीना है। जीते रहना है।
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जीवन का गणित भी सही सही ' मान लो ' से चलता है।
― 21 फरवरी 2025 / 11:05 रात
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