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बसंत का पीलापन


धारा एक बार टूट जाए तो फिर उसमें वो रवानी भी टूट जाती है। धारा फिर लौट सकती है रवानी नहीं लौटती। मन किसी व्यक्ति, वस्तु, जगह, या भाव से एक बार हट जाए तो फिर जुड़ता नहीं है, उसमें न वह विश्वास बचता है न पहले सी टीस... हम फिर एक सामाजिक गरिमा को जीते हैं सम्बन्धों को नहीं। मन भी ऐसा ही है जब उसे बार बार तोड़ा जाए, वह कहा जाए जो नहीं कहना चाहिए, वह दिया जाए जो वह स्वतः स्वीकार नहीं करना चाहता तो फिर मन धीरे सूख जाता है। यह वैसे ही है जैसे किसी पौधे की कटिंग करना और उसे बढ़ने का अवसर न देना। कटिंग तब ठीक है जब बढ़ने का अवसर दिया जाए अन्यथा पौधे सूख जाते हैं। सूख जाना भी चाहिए। 

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आज बसंत पंचमी है, आज ही की तिथि पर पहली बार महाप्राण की कविता ' वीणा वादिनी वर दे' पढ़ी थी, तब शायद मैं छठवीं में था, मेरे हाथ पाँव काँप रहे थे, मुझे मुख्य बनना कभी पसंद नहीं था मैं नेपथ्य में रहना चुनता था, मगर क्रेडिट की इच्छा बनी रहती थी, बचपन में.. अब कोई फर्क ही नहीं पड़ता। 

मैं कोई हूँ.. यह भी अब जल्दी सोचता ही नहीं। ऐसी ही एक तिथि को जब मैं आठवी में था तो एक नाटक बनाया था, नेता कार्यकर्ता और अधिकारियों की मिलीभगत पर, उसे लिखा था, संवाद के ढाला था, वह मेरी शायद पहली लिखत थी, उससे पहले जो लिखा था वह क्या था मैं ख़ुद नहीं जानता, जहाँ तक मुझे याद है मैंने पहली बार नाना के टीवी वाले घर में एक रात में रोते हुए कुछ लिखा था, अंधेरे में , बस लिख रहा था, क्या ? पता नहीं, तब मैं 8 या 9 बरस का रहा होऊँगा। सुबह देखा तो सारे शब्द एक दूसरे पर चढ़े हुए थे। अंधेरे में कहाँ सही होता है कुछ। उस समय तब मुझे उस नाटक के लिए विधायक द्वारा 500 की पीली वाली नोट मिली थी जो मैंने स्वीकार नहीं किया था, क्यूँ ? यह याद नहीं है। उस कार्यक्रम से मैं नाराज़ होकर गया था, प्रधानाचार्य मेरे पीछे पीछे मुझे मना रहे थे मैं माना नहीं।

मुझे अपने रूठने की घटना याद नहीं, वह भाव याद है कि मुझे बहुत शर्म महसूस हुई थी। मेरे कान गर्म हो गए थे, हाथ पाँव काँप रहे थे। मुझे कुछ मांगना पसंद नहीं, और मैंने शायद कुछ माँगा था जिसपर कुछ बहुत बुरा बोला गया था। मुख्य रास्ते से नहीं आ पा रहा था क्योंकि भीड़ बहुत थी, हम सब वही नाटक का मंचन करके उतरे ही थी, लोग मुझे छू रहे थे, तारीफ़ कर रहे थे, मैंने कुछ कहा जिसपर मुझे इनकार कर दिया गया, शायद खाना माँगा था, जिसके जवाब में एक यादव गुरुजी थे उन्हें कुछ ग़लत बोला था, मेरा आत्मसम्मान टूट गया , मैं साइकिल कन्धे पर रखकर बगल सरपत  बबूल और रुशे के जंगल से निकल आया था, घर तक रोते हुए गया। वैसे ही चेहरे पर काले रंग से बनी मूछ और कुर्ता पजामा पहने ।  मुझे वो आँसू नहीं भूलता। आसूँ जितने गिरे कोई नहीं भूलते। उसके बाद कभी मंच पर नहीं चढ़ा।  मैं पानी बताशे भी कभी हाथ फैला के नहीं खाता। न जाने क्यूँ, मैं एक बार कुछ कह दूँ और वह नहीं हो तो मैं मर जाऊँ दुबारा मुँह न खोलूँ.. मैंने सबसे ज्यादा हाथ प्रेम में फैलाए, मैं याचक हो गया, जो जो नहीं पसंद थे जिनसे मेरे भीतर आग लगती थी वह सब एकदम शांत होकर किया। न जाने कैसे हुआ यह सब मैं ख़ुद नहीं जानता। कुछ स्वभाव जन्मजात होते हैं वह क्यूँ आए हमें नहीं पता होता। 

और यूं आज की तारीख़ अलग तरह से महत्वपूर्ण है, जीवन चुन लिया था, सोच लिया था अब यहीं मरना है, फिर उसके लिए कुछ करना पड़े, मैं दिमाग पर नहीं चलता, जो मन कह देता है करता हूँ, दिमाग कभी नहीं चाहता हम खुल कर जिएँ। मगर आज उत्कट इच्छा होने के बावजूद नहीं देख सकता...... 

ख़ैर ठीक है ! इंतज़ार की कोई तो सीमा होगी ही। 

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जायसी ग्रंथावली खत्म हुई। अभी फिर पढ़ना है। गोर्की की तीन कहानी पढ़ी, ज्यां देरिदा का सिद्धांत समझने का प्रयास किया, जैनेंद्र की कहानी पत्नी पढ़ी, उसमें पत्नी नहीं है एक ऐसी स्त्री है जो स्त्री नहीं है, एक ऐसी आवाज़ है जिसमें कम्पन नहीं। वह भीतर तक हिला गयी। 

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सब्जियों की नयी पौध की तैयारी हो रही है, अब गोभी आलू , मटर, पालक का समय जा रहा है, कद्दू, लौकी, तुरई, भिंडी, करेले और बीन्स का दिन आ रहा है, प्याज लगानी है। कल तक सम्भवतः .. 

आज शादियाँ थी कई और एक भोजन का निमंत्रण थक गया हूँ। तन से नहीं, मन से। 

मन जो चाहता है उसे वह नहीं मिलता तो मन कहीं नहीं लगता। जबरन लगाना ही पड़ेगा। क्या लग जाएगा ?

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एक महीना बीत गया। शायद यह भी बीतेगा यूँ ही। क्या होगा राम जाने .. 

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आत्मशोधन के दौरान ही सबसे भीषण आत्मग्लानि होती है। मैं उसी दौर में हूँ। निकल जाऊँगा। मैं चीजें जल्दी छोड़ नहीं पाता, छोड़ देता हूँ तो लौटता नहीं कभी। 

― 2 फरवरी 2025 / रात 10 : 15 

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