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फिर वही रात है... रात है ख़्वाब की...

किसी का शेर है कि ; रो रो के किस तरह से कटी रात क्या कहें / मर मर के कैसे की है सहर कुछ न पूछिए 

बात कुछ कुछ यही है मगर ख़ैर.. 


रात सुंदर थी। वो रातें सुंदर होतीं हैं जिनमें साथी मन खुलकर कह दे। ऐसे अवसर कम ही होतें हैं। जब मन सच सच कहा जाता है। दुःख और सुख की अनुभूति एक ही क्षण में होती है। रोया। लेकिन रोने को सुबह तक भूल गया। वो साथ कभी नहीं टूटता जिनमें दोनों पक्षों में एक दूसरे को पकड़े रहने की ललक हो.. ज़िद हो पर इस साथ के लिए हो। 

तुम्हारी आँख से गिरे एक एक बूंद आँसू पर मेरे होंठो का  हक है, भले मैं उस दिन नमक न खाऊं मगर तुम्हारे आँसू नहीं गिरने दूँगा। जब जब तुम्हारी आँखों से आसूँ आते हैं मुझे लगता मेरा कोई पाप तुम्हारे हिस्से गया, जो नहीं होना चाहिए। मुझे तुम्हारा सब दुःख सोख लेना है, मुझमें अथाह सामर्थ्य है। तुम हमारे प्रेम को गर्भ में रख सकती हो तो मैं तुम्हें....

हमें हमारे आँसू और क़रीब ले आते हैं। आँसू ही हैं जिनमें कोई तीसरा नहीं होता बस हम होते हैं।

रात दो बजे से ही फोन में एक अलार्म बज रहा है, उसे मैं जान बूझ कर बन्द भी नहीं कर रहा हूँ। जब वो बजता है और फोन पर फ़्लैश होता है ' ....... आएगी ', मैं कुछ एक क्षण को सही ख़ुश हो जाता हूँ। वो उम्मीद की ध्वनि है। वैसे भी मैं तुम्हारे आने के दिनों की रातों में सो कहाँ ही सो पाता हूँ। शहर में टिके रहने की हिम्मत थी उस तारीख में.. अब चला जाऊंगा। अब यह न कहना कि जैसे तुमसे कोई पाप हो रहा है, यह वो भावनाएं हैं जो बस तुम्हारी हैं इन्हें सहेज लो, आज अवसर नहीं तो न सही जब होगा तो इसे देखना और फिर वह करना जो तुम करना चाहती हो.. तोड़ना अपनी सीमाएं, गले से लगा लिया करना मुझे भरे चौराहे, हाथ पकड़कर चलना मेरे साथ... तब हम साथ गाया करेंगे.. ' बड़े अच्छे लगते हैं...' तुम्हें पूछना नहीं पड़ेगा और ? मैं तुम्हारे चेहरे को अपने दोनों हाथों से समेट तुम्हारी आंखों में देखकर कहूँगा... तुम , तुम और बस तुम.. देखो यह भी बहर में है... कवि आदमी के साथ रहने का यह तो फायदा है वो हर काम या तो मीटर में करता है.. या सब तोड़ता है तो कहता है ' ............ ' वही जिसके जवाब में तुम हूँ कहती हो बस..!

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शहर के किसी फूल वाले का नुकसान हुआ, तुम होती तो सफ़ेद फूल तुम्हारे पास होते। 

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आज प्यार जाहिर करने का दिन है। मैं आभार व्यक्त करना चाहता हूँ तुम्हारा। प्यार तो मेरा तुम जानती ही हो।

आभार उन तमाम लोगों का भी जिन्होंने हमें कुण्ठा, विद्वेष और घृणा की नज़र से देखा। जिन्होंने हमसे माफ़ी माँगी फिर उन्हीं के साथ घूमते दिखे। तस्वीरें खिंचवाई और भूल गए कि इसी के लिए माफी की उम्मीद की थी उन्होंने कभी हमसे। उनका भी जिनको स्वीकार नहीं हुआ हमारा साथ। उनको ईश्वर बरकत दे। उन सभी की ऊर्जाएं क्षरित हों, वो इतने निष्पाप हो जाएं कि अपने पूर्व कृतयों का ताप न सह सकें। 

लगभग दो वर्ष पहले इन्हीं दिनों ने हमारे भीतर जीवन उगाने लायक मौसम दिया था। वो दिन कितने सुंदर थे। 

इस दो के पीछे शून्य बढ़ें। मैं तुमसे पहले बूढ़ा होकर... तुम्हें वह सब देकर जाऊँ जिसे तुम बस अपना कह सको। 

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कई दिनों से कहीं नहीं निकला। अब कल निकलूँगा। उन सभी जगहों को देखूंगा , छू लूँगा, जहाँ तुम्हारी अनुभूति है। उस गली तक जाऊँगा जहाँ मैं कोई हूँ.. फिर छोडूंगा शहर इस उम्मीद के साथ की तीसरी बार तुम्हारे बिना इस शहर में न आना पड़े न जाना... इन्हीं किसी दिनों में हमने कहा था न.. हम जब भी कहीं जाएंगे एक दूसरे को एक पल को सही सामने से देखकर जाएंगे। तुमने उस बात के लिए बहुत कुछ सहा है मैं जानता हूँ.. 

तुम्हें सीने से लगा लेने का मन है रे....

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दुनिया में इतनी राजनीति क्यूँ है ? जिन्हें हम भावनाओं का लम्बरदार समझते हैं उनमें जब राजनीति दिखती है तो कष्ट होता है, एक आयोजन में कविता पाठ के लिए बोला था एक वरिष्ठ कवि ने, फिर मना किया कि तुम संगठन से नहीं हो तो सबको दिक्कत हो रही है, फिर कहा वह आयोजन ही स्थगित है, आज देखा वह आयोजन हुआ, उनमें वह सारे लोग थे, जिनके नामों की चर्चा हुई थी। भीतर घिन हुई मुझे.. लोभ नहीं है मुझे किसी चीज है। मैं आदमी से सच्चे होने की उम्मीद करता हूँ बस.. 

बसंत सर फोन किए थे। हाल चाल के बाद कहा मार्च में लखनऊ में एक कविता पाठ है मैं चाहता हूँ तुम जाओ.. मन हुआ तुरंत मना कर दूं। फिर तुम्हारी कुछ बात जहन में घूमी.. और कह दिया ठीक है। मार्च में मैं अगर मिल सका तो तुम्हारे अलावा किसी से मिलना और जबरदस्ती खीस निपोरना नहीं चाहता। 

कविता लिखने पढ़ने के मानी मर गए हैं। क्या मतलब है इन सब का.. ख़ैर आखिरी बात वही है जो तुम कहोगी।

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दिन दिन जैसा बीता। सुंदर। दीदी गईं अपने घर। माँ अब गांव में अकेली हैं। पिताजी लखनऊ ही हैं। और सब ठीक ही है। 

हिंदी कहानी निबंध और कुछ उपन्यासों के बारे में पढ़ा। शुक्ल जी का इतिहास पढ़ने लगा तो भूल गया सब। वही पढ़ता रह गया। 

कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ। एक कहानी महीनों से लिखना चाह रहा हूँ पहला वाक्य नहीं मिल रहा। न जाने कब मिलेगा। 

साबूदाने की खिचड़ी याद आ रही थी आज मुझे.... 

― 14 फरवरी 2025 / 7 : 40 शाम



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