बहुत कुछ पूरा होता है तब भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। कई बरस पहले ही किसी कविता में कहा था 'नमी जब ज्यादा हो तो बीज उगते नहीं हैं सड़ जाते हैं' उसे फिर फिर महसूसने का दिन रहा। पिछले 24 घण्टों में कई बार डायरी खोले बैठा। बैठा ही रहा। एक शब्द नहीं लिख पाया। आत्माख्यान, आत्मलीन और आत्मरत होकर नहीं लिखा जा सकता। अपने से अलग होना पड़ता है। नहीं लिख पाया। एक शब्द भी नहीं। एक ख़ालिस डॉट या पूर्णविराम भी नहीं। कागज कोरा का कोरा रहा। हाँ, दो चार बूंद आँसू जरूर गिरे। फिर उस पर कुछ लिखा नहीं। तारीख़ डाल दिया अभी। और पन्ना बदल दिया। कोई कभी पढ़ पाया तो वही जान पाएगा वह जो उसपर सम्भावित था लिखा जाना। शायद नहीं जान पाएगा। नहीं जान पाएगा तो मेरा ही फायदा है। यूँ भी तो मेरा मन सबका मन रखने के लिए बना है। मेरा मन कहीं कोने में रख दिया गया था बरसों पहले। कौन जतन करेगा उसे उठाकर झाड़ पोंछ कर देखने की। मैं खुद भी नहीं करता।
अपने हाथ से बिछाए फूल अपने ही हाथ से समेटे। समेटते हुए वह मखमली नहीं लग रहे थे। कँटीले भी नहीं थे। सब वैसे का वैसे रख दिया। बिल्कुल यंत्रवत रहा। कपड़े निकाले सिरहाने रखी कुर्सी पर रख दिया। बिल्कुल निर्वस्त्र हो खड़ा था अपने सम्मुख और पूछ रहा था ख़ुद से क्या है तुममें ऐसा जो तुम्हें कोई छुए ? क्यूँ किसी के होंठ तुम्हारे पास आकर कहेंगे की वह इस देह पर एकाधिकार चाहता है ? क्यूँ कोई तुम्हारे देह को नापेगा अपनी बिल्कुल नयी आँखों से, जबकि उस पर चिपकी हैं इतनी आँखे ? कौन हो तुम ? तुम्हारी कोई औकात नहीं। अगर तुमसे कोई प्रेम नहीं करता तो तुम अब तक निरर्थक और बिल्कुल निरुद्देश्य सा जीवन जीते। वैसे ही लेट गया। उन स्पर्शों को महसूता रहा जो मैं देना चाहता था। पाना चाहता है। हम अजीब पीढ़ी हैं हमें जहाँ नग्नता को समारोह की तरह जीना चाहिए वहाँ हमें संस्कार घेर लेते हैं और जहाँ संस्कार का समारोह चाहिए वहाँ हम बिल्कुल नग्न हो जाते हैं। हम अपने आप से ज्यादा लोगों के लिए जीने लगते हैं और भूल जाते हैं लोग तुम्हारे सामने नग्न खड़े हैं कि तुम उनकी नग्नता पर मोहित हो जाओ। वो भूले हुए हैं कि नग्नता मोहित नहीं विचलित करती है। सुंदर फूल हमेशा आवरण में खिलते हैं।
रात विचारों की चादर से संभोग करते बीती। चादर ने मुझे बिल्कुल वैसे ही छुआ जैसे मैंने उसे। हम दोनों में एक दूसरे का होने का समान स्तर का उन्स था। नींद हमें छू भी नहीं पाई। तुम्हारे जीवनद्वारों की महक मेरी आत्मा में घुलती रही। मैं महसूसता रहा कि तुम्हारे हाथ मेरे बालों में चल रहे हैं। जैसे तुम कह रही हो कि यहाँ से हटना मत यही जगह है तुम्हारी। यही सबसे सुंदर लगते हो तुम मुझे। मैं इस बात के ख़ुश होता रहा कि तुम ख़ुश हो और इस बात से डरता भी रहा कि तुम अभी कुछ घड़ी बाद ही भर जाओगी ग्लानि से। तुम्हें चुभने लगूँगा मैं। हटा दोगी मेरे हाथ। तुम्हें आकर घेर लेगा कोई अदृश्य आदर्श विचार जो पूरा जतन करेंगे कि तुम कह दो सबसे सुंदर क्षण को बुरा। तुम्हें ख़्याल भी नहीं होगा कि जो तुम्हारे लिए नदी लेकर खड़ा है उसे भी प्यास लगी होगी। मैं बरसों से बस प्यासा ही रह जाता हूँ। मेरा गला सूखता जा रहा है। मैं कब मरूँगा साथी..? क्या उस दिन जिस दिन मुझे पानी मिल जाएगा। क्या कोई मेरे लिए भी लेकर आएगा नदी ?
मैं हर बार कई जरूरी कामों के बीच कुछ कम जरूरी काम की तरह छूट जाता हूँ और अगली योजना में प्रमुख की तरह रख लिया जाता। मुझमें हावी होने की प्रवृत्ति नहीं थी न ही अपने अधिकारों के लिए लड़ पाने की। मैं चाहता रहा कोई मेरी आवाज़ बने। बस चाहता रहा। कह भी नहीं पाया। तुम मुझे भीतर से आंदोलित करती हो। मैं वह कर जाता हूँ जिसके लिए सोचा तक नहीं था। निश्चित समय में जीने और लिखने की मेरी आदत नहीं। फिर भी हो जाता है। मैं आत्मविश्वास से भर जाता हूँ। मैं कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत से खड़ा हूँ। अगले कुछ महीनों की नयी योजना के साथ तुम मुझे कुछ दिन और जीने का बिल पकड़ा गयी हो।
अति क्रोधी और आत्मसम्मान के भाव बोध से भरा व्यक्ति जब दुत्कार के बाद भी खड़ा रहे हँसता रहे तो जरूर उसकी आत्मा को प्रेम ने छू लिया होगा। प्रेम में देह जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही नगण्य भी। दैहिक इच्छाएँ क्षण भर की हैं । प्रेम सरस्वती नदी है। वह न दिखकर भी रहता है।
संगम दो देहों की स-देह उपस्थित और तीसरे ( प्रेम ) की आत्मिक संगति में ही सम्भव होता है।
मैं पसीने से तर-ब-तर हूँ मगर मुझे गर्मी तनिक भी नहीं लग रही है।
इस दुनिया को अगर कुछ बदल सकता है तो वह प्रेम है। प्रेम आदमी से कुछ भी करवा सकता है। प्रेम आदमी की रीढ़ खा लेता है। उसे नयी रीढ़ देता है। जिसमें लचीलापन होता है। प्रेम ऐसा विरोध सिखाता है। जो और कोई नहीं सिखा सकता। प्रेम आदमी औरत अलग अलग लिंग नस्ल को बस आत्मा बना कर छोड़ देता है। प्रेम हममें देह की लालसा भरता है। उस देह की जिसमें वह आत्मा रहती है जिससे हम प्रेम करते हैं। प्रेम हमें निर्भर करता है और आत्मनिर्भर भी। प्रेम हमें बिछ जाने को कहता है और तनकर खड़े हो जाने को भी। प्रेम हमें सब सिखाता है सिवा घृणा करने के।
जे कृष्णमूर्ति कहते हैं। ' we are memory ' याद ही तो हैं हम सब। इसी याद की लड़ाई है। इसी याद की शिकायत। इसमें कोई भी शिकायत तुमसे नहीं है। सब उस याद की शिकायत है जो तुम्हारे भीतर सुंदर भावनाओं के प्रति ग्लानि और शर्म पैदा करती है।
हमने उम्मीद से ज्यादा जीवन जिया। कम समय को कम समय नहीं रहने दिया। छूटने की टीस जरूरी है। किसी न किसी की आंख में नमी जरूरी है। प्रेम हमेशा फूल ही नहीं शूल भी लगना चाहिए। लगता है।
घर छूट गया। लग रहा बे-घर हो गया। घर मुझसे छूटा या मैं घर से पता नहीं। घर मुझे कम दिनों के लिए नसीब होता है। ज्यादातर मैं घर की याद में रहता हूँ।
खाना खाने बैठा। लग रहा था आँसू भीतर की ओर बह रहें हैं। सब खारा लग रहा है। खाते हुए रुलाई आ जाए तो न खाया जाता है न सही से रोया ही जाता है। वही हुआ। दिन भर मुर्दा की तरह पड़ा रहा। किलोमीटर गिनता रहा। अगली तारीख़ पर नोट चिपकाता रहा। शुक्रिया कहता रहा। यह तय करता रहा कि अब हमें क्या नहीं करना है। किताबें सेट की। मेज सही किया। एक सुंदर स्वप्न से उठा।
बैठा रहा देर तक दीवार ताकते। फिर अभी डायरी लेकर। जब जब भीतर विचार बेवजह उधम मचाने लगते हैं तुम्हारी ही तरह खुद से कहता हूँ । चुप रहो...।
तुम्हें रत्ती भर याद नहीं किया।
कल से आज दिनभर में बस कुल 48 वाक्य बोला है। एक कविता के 6 वाक्य । पिताजी से बात के कुछ 10 वाक्य। बच्ची से बात के 2 वाक्य। मम्मी से बात के 4 और जो बचे गिन लो।
― 6 मार्च 2025 / 7 : 40 शाम
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