सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

निरर्थक का अर्थ


यात्रा जारी है। यह मेरी यात्रा नहीं है। भविष्य के गर्त की ओर जाने की यात्रा है। मैं किसी गोल पिण्ड की तरह रफ़्तार में मौत नाम की खाई की तरफ लुढ़क रहा हूँ। तुम कहीं बीच में मिलोगी। फिर हम साथ लुढकेंगे। लुढ़कना रुकेगा नहीं । 

*************

बहुत ज्यादा सोचता हूँ पर बोलता हूँ बहुत कम। जब बहुत बोलता हूं तो बिल्कुल नहीं सोचता। बोलने के बाद सोचता हूँ ज्यादा तो नहीं बोल गया, फिर ख़ुद पर शर्मिंदा होता है , माफ़ी मांगता हूं। फिर तब तक चुप रहता हूँ जब तक अपने होने की याद बनी रहती है। 

**************

सुबह उठते ही पाँव फोड़ लिया। हड़बड़ी मेरी मेरे लिए हर बार खतरनाक हुई। पिताजी को परेशान किया वो स्टेशन आकर खड़े थे। फिर बताया बस से आउंगा तो लौटकर गए। फिर आए घण्टे भर बाद। यह चोट से ज्यादा पीड़ादायक था। साथ जाने की बात थी अकेले गया। अकेले अकेले अकेले ही रहा।


वर्तिका जी से मिला। कोई साहित्यिक बात नहीं हुई। पढ़ाई लिखाई नौकरी घर गाँव की चर्चा हुई। उनमें एक अजीब छटपटाहट है। न जाने कैसी। जैसे वह जानती नहीं उन्हें क्या करना चाहिए। लिखना ठीक है उनका। और ठीक हो सकता है। रवि के सत्कार ने मन मोह लिया। उसे कुछ देना चाहता था पर नहीं दे सका। एक फूल का पौधा दिया। केतन से बातचीत हुई कुछ दुनियावी। मैं बोलते हुए पीछे की राजनीति और आगे की हानि लाभ सोचे बिना बोलता हूँ । अगर आपको यह स्वीकार है तो आपकी ही बेहतरी है मेरा कोई फायदा नहीं। 

कैफ़ी आज़मी एकेडमी गया। 2022 दिसम्बर के बाद फिर कविता पढ़ने मंच पर खड़ा था। अब हाथ पाँव नहीं काँपते। कुछ भी और कैसे भी बोल सकता हूँ । सबने कविता पढ़ी। अच्छी कविता। राजनीति हर कविता के मूल में थी। प्रेम कविता में भी राजनीति और राजनीतिक कविता में प्रेम खटकता है। दरअसल बिल्कुल बेकार लगता है। कवि जब यह करता है तो वह अपना कवित्व खो देता है। तुकबंदी का दौर उठ गया है । छंद के नाम पर रद्दी तुकबंदी चलाने के प्रयास ने हिंदी कविता का बंटाधार कर दिया है। पुरुष कवियों में क्रंति और स्त्री कविताओं से चांद तारा जुगनू और मम्मी दादी को हटा दिया जाए तो कविता में कुछ बचती नहीं है। कन्सट्रक्टिब कविता का दौर है यह। मैं बिल्कुल बेकार वाचन करता हूँ। मैं जल्दी निपटने के चक्कर में फंस जाता हूँ। मैं कविता पढ़ना खासकर बन्द कमरे में अपनी ऊर्जा को निरर्थक लगता है। 

गौहर रजा ने थोड़ा थोड़ा भटकता हुआ मगर अच्छा वक्त्व दिया। उन्होंने एक बात कहीं की उन्होंने 30 साल से लगातार कुम्भ पर अध्धयन किया। हर साल की खोज उनकी उम्मीद से बिल्कुल अलग जाती थी। पर इस बार वो अचंभित थे कि लोगों का भरोसा अंधविश्वास पर नहीं विज्ञान पर अधिक था। उन्होंने कहा अब धर्म सांस्कृतिक नहीं बचे हैं  राजनीति धार्मिक हो गया है। उनका लहजा बड़ा सुंदर था। पर वो एक समुदाय से आगे नहीं बढ़ते उन्होंने बाबा दिखते हैं मौलाना नहीं। ख़ैर ! सबकी अपनी टॉर्च है वह बेच रहा है। 

कार्यक्रम के बात बेवजह की बतकही हुई। मैं दारू शराब सिगरेट में रहता नहीं तो निकल आया। धुंआ भी नहीं पी पाता तो चाय भी अकेले रवि के साथ पिया। पुलिस लाइंस के अंदर। जहाँ लखनऊ आने पर शुरुआत में पीता था राजीव के साथ। कहीं और नहीं गया। जाता। तुम होती तो। सोचा तो तुम सामने बैठकर सुनोगी मुझे फिर तुमसे पूछुंगा कमी बताओ। सच तुम्हीं बोल सकती हो। और तो सब .. 

तुम कहाँ हो ? 

लौट रहा हूँ। रास्ते में हूँ। सर फट रहा है। मुझे बन्द गाड़ियों से बड़ी दिक्कत होती है। हो रही है । 

― 2 मार्च 2025 / 9 : 20 रात 


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...