जीवन धीरे धीरे क्या होता जा रहा है पता नहीं, अपने प्रति आशंकाओं से भर गया हूँ। जीवन जीना कम बचे रहना ज्यादा लगने लगा है। पुरानी गलतियों का पछतावा है पर उन्हें बदल नहीं पा रहा हूँ। हर कदम किसी नयी विफलता की तरह लगता है। एक चुप्पी घेरे रहती है। जबकि एकदम सही रूटीन में हूँ पढ़ रहा हूँ, खा रहा हूँ, सो भी जा रहा हूँ.. आसपास घर परिवार भी सब ठीक है, पर भविष्य की चिंता जैसे मेरी जबान सिल देती है, अजीब सी थकन हावी हुई रहती है। इन दिनों कोई प्रेमवश भी पूछ लेता है पैसा भेज दूँ ? या ठीक तो हो ? तो चिढ़ होती है, अलग अलग जगहों पर हाथ पाँव मार रहा हूँ, पर जैसे हर जगह से धकेल दिया जा रहा हूँ। मन करता है कोई कन्धा मिल जाए, जिससे सब कह सकूँ, पर क्या कहना चाहता हूँ वह भी नहीं पता है.. सब अधर में है। समझ भी सब आता है पर उस समझने में जीवन नहीं दिखता। फिर यह भी सोचता हूँ मैं जिसका कन्धा चाह रहा हूँ उसका कन्धा मैं ही क्यूँ न बन जाऊँ.. मन दबा लेने में क्या हर्ज़ है। अपने मन का कुछ बोलने पर या मन की कोई इच्छा कह देने पर लगता है कहीं मैं भार तो नहीं डाल रहा हूँ उस पर, जिसे सबसे हल्का रखना चाहता हूँ। कई...