जीवन धीरे धीरे क्या होता जा रहा है पता नहीं, अपने प्रति आशंकाओं से भर गया हूँ। जीवन जीना कम बचे रहना ज्यादा लगने लगा है। पुरानी गलतियों का पछतावा है पर उन्हें बदल नहीं पा रहा हूँ। हर कदम किसी नयी विफलता की तरह लगता है। एक चुप्पी घेरे रहती है। जबकि एकदम सही रूटीन में हूँ पढ़ रहा हूँ, खा रहा हूँ, सो भी जा रहा हूँ.. आसपास घर परिवार भी सब ठीक है, पर भविष्य की चिंता जैसे मेरी जबान सिल देती है, अजीब सी थकन हावी हुई रहती है। इन दिनों कोई प्रेमवश भी पूछ लेता है पैसा भेज दूँ ? या ठीक तो हो ? तो चिढ़ होती है, अलग अलग जगहों पर हाथ पाँव मार रहा हूँ, पर जैसे हर जगह से धकेल दिया जा रहा हूँ। मन करता है कोई कन्धा मिल जाए, जिससे सब कह सकूँ, पर क्या कहना चाहता हूँ वह भी नहीं पता है.. सब अधर में है। समझ भी सब आता है पर उस समझने में जीवन नहीं दिखता। फिर यह भी सोचता हूँ मैं जिसका कन्धा चाह रहा हूँ उसका कन्धा मैं ही क्यूँ न बन जाऊँ.. मन दबा लेने में क्या हर्ज़ है।
अपने मन का कुछ बोलने पर या मन की कोई इच्छा कह देने पर लगता है कहीं मैं भार तो नहीं डाल रहा हूँ उस पर, जिसे सबसे हल्का रखना चाहता हूँ। कई बार तो 'मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ' जैसे सुंदर वाक्य कहने से पहले मैं जितने उत्साह से भरा होता हूँ उसे कहते ही उत्साहशून्य हो जाता हूँ। लगता है यह सामने वाले को अच्छा महसूस करने से अलग कहीं भावनाओं के बोझ सा न महसूस होने लगे। कहने से पहले के मुझमें और कहने के बाद के मुझमें, बड़ा फ़र्क़ हो जाता है। मैं वह नहीं रह जाता जो कुछ क्षण पहले तक होता हूँ।
कभी कभी जब देर तक ख़ुद को सोचता हूँ तो लगता है वह कोई और व्यक्ति है जो बस उसके लिए है, मैं तो इतना एक्सप्रेसिव नहीं था किसी मामले में, फिर प्यार क्यूँ जताता रहता हूँ ? जवाब मिलता है, पर वह जवाब किसी और को बताया नहीं जा सकता।
हम उन्हीं पीड़ाओं की दवा बनाते हैं जो हमें होतीं हैं। हम जीवन को उसी रूप में जानते हैं जिस रूप में जीवन हमें ज़िंदा रखता है। हम अलग अलग उपन्यासों और कहानीयों से सीख सकते हैं, उनमें बुनी फैंटसी को जीने का प्रयास कर सकते हैं, पर वैसे का वैसे ही जीवन नहीं बना सकते। जीवन बनाने से बन जाता है क्या ? मुझे तो नहीं लगता। इतने दिनों से मैं जीवन की योजना बना रहा हूँ वह विफल होती जाती है। कहीं रहना चाहता हूँ रहता कहीं हूँ, कहीं जाना चाहता हूँ नहीं जा पाता, किसी से कहता हूँ 'मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण तुम हो बाद में सब ' उससे यह नहीं सुन पाता, कई कई बार तो कुछ बातों से डर जाता हूँ, ऐसा भी सोचा जा सकता है क्या ? पर चुप रह जाता हूँ। बोलना चाहता हूँ पर भीतर कोई है जो कहता है हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है, उन्हें बस सुन लिया जाता है, ग़लती कभी व्यक्ति की नहीं होती समय की होती है जैसे वाक्य से अपने मन को समझा कर चुप हो जाता हूँ। जानता हूँ जो चुप्पी अभी कष्टकारी लग रही है वही आनंद भी देगी। अभी उस कष्ट का आंनद लेना है।
याद रखो तुम जिनसे प्रेम करते हो उन्हें चुप्पी में मत जीने दो.. कुछ कुछ घड़ी पर हवा के झोंके की तरह उस दर तक जाओ और गुज़र जाओ। ठहरो भी मत की चुभने लगो, पर गायब भी न हो कि दिखो ही नहीं।
तुम एक दिन जानोगे की तुम्हें जिस चुप्पी से पीड़ा मिली है उसका उपचार किसी और को उस पीड़ा से न गुजरने देने में ही है। अपने झेले दुःख को किसी और को न झेलने देने में ही आंनद है फिर चाहे जीवन जीना लगे या बचे रहना। तुम्हें आनंद आएगा। और फिर आंनद ही तो जरूरी है...
― आशुतोष प्रसिद्ध
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