सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

इच्छाओं का संत्रास


इच्छाएँ बेघर होतीं हैं, उन्हें जहाँ भी चार दीवार और एक छत का आसरा दिखता है, वो वहीं टिक जाना चाहती हैं, 

मनुष्य का मन इच्छाओं का पहला घर है , चारों तरफ भटकने के बाद पहली बार उसे मनुष्य ही अपने रहने योग्य लगा। वहाँ जब रहना शुरू किया तो इच्छा के भीतर भी एक इच्छा पैदा हुई, उस घर को अपने अनुरूप करने का।  वह दिन बा दिन पाँव फैलाती गयी और एक दिन उसका पाँव इतना फैल गया कि उसे एक देह कम लगने लगी, फिर उसने लगातार मंथरा की तरह पहली वाली देह का कान भरा कि अरे तुम तो एक दूसरी देह के बिना अपूर्ण हो, प्रेम के बिना तो बिल्कुल ही बेकार, बाहरी साज सज्जा तो बहुत ही जरूरी है, और फिर शुरू हुआ यह खेल जो आज हम आप देख रहें हैं। 


एक देह ने एक और देह खोजा, उसके भीतर अपने भीतर की इच्छा को पाँव पसारने के लिए जगह बनाया, और उस देह के भीतर की इच्छा को अपने भीतर पाँव पसारने की जगह दी। अब एक देह में कई इच्छाओं ने घर बना लिया। इन इच्छाओं की आपस में पटती नहीं है, पटे भी कैसे, जैसे हर मनुष्य की एक नियति है वैसे ही हर इच्छा की भी, इच्छाओं की उम्र अनिश्चित होती है, कुछ तो वह जन्म लेते ही मृत हो जाती हैं, कुछ देह के साथ साथ चलती रहती हैं, मनुष्य के चेहरे पर जो अनगिनत खरोंचों के निशान दिखते हैं वह इन्हीं इच्छाओं के दिए होते हैं, मनुष्य देह में रहने से इच्छाओं ने मनुष्य गुण ले लिया अब वह मनुष्यों से तेज संख्या में बढ़ रही हैं, उन्हीं संख्या अब इतनी अधिक हो गई है कि मनुष्य की देह उन्हें जगह देने को कम पड़ रही है, घर बनाने की होड़ मनुष्यों से ज्यादा इच्छाओं में मची है। इसका अंत कहाँ होगा पता नहीं ! मगर होगा। बहुत वीभत्स होगा। 


आप सोच रहें होंगे मैं यह सब क्यूँ बता रहा हूँ ? मैं आपको उस संरचना से अवगत करा रहा हूँ जिससे मैं जकड़ा हुआ हूँ। 

इच्छाओं से जन्मी कल्पनाओं ने और उन कल्पनाओं से जन्मे सुख की अनुभूति ने जीवन को दुःख की पर्यायवाची की तरह कर दिया है। इच्छाओं ने इतना घेर लिया है की सांस नहीं आ रही है, मैं इस इच्छा जाल से बाहर निकलना चाहता हूँ तो इच्छा की राइट हैंड कल्पना और कल्पना की राइट हैंड सुख मोहनी की तरह मुझे मदमस्त किए जा रही है, आँखों से दूर दृष्टि की ताकत गायब होती चली जा रही है, मुझसे जीवन कलश में भरा अमृत दूर होता चला जा रहा है। मैं क्या करूँ ? किसको आवाज़ दूँ जो मुझे इस जाल से निकाले ?  क्या यहाँ कोई है जिसने इच्छा को अपने भीतर जगह न दिया हो ? कोई हो तो कृपया मुझे बचाए..

― आशुतोष प्रसिद्ध 


Image source :- pinterest

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...