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दिन-विषयक

सोना ने बछड़े को जन्म दिया है, घर में सब ऐसे ख़ुश हैं जैसे नाती आ गया है। हिन्दू परिवारों की यह अच्छी आदत है वो अपने आसपास जन्में हर नवजात से अपनी औलाद सा स्नेह करते हैं। आज अंदर से अच्छा महसूस होता रहा दिन भर, पिछले कुछ वर्ष से मैं जब ख़ुश होता हूँ या दुःखी मुझे एक ही शख़्स याद आता है, कुत्ते के बच्चों, और किताबों में उलझा हुआ।मेरा घर..!

सुबह दो दिन बाद आज सुबह सी लगी, जीवन कुछ चेहरों को देख भर लेने से कितना जीवन की तरह लगने लगता है। सब तकलीफ भूल जाती है। 

एक उम्मीद थी मगर मेरी उम्मीद तो टूटनी ही होती है सो टूट गयी। मुझे मन के समय पर कुछ नहीं मिलता। बाद मेरा मन मर जाता है तब उसके होने न होने का मुझे कोई असर नहीं होता। फिर जब कोई पूछता है ख़ुश क्यूँ नहीं होते आप..मैं नहीं कह पाता, यह इच्छा मेरे भीतर उत्कर्ष तक जाकर सूख गयी है। आज भी वही हुआ।  

एक शेर कल रात से ही गुनगुना रहा हूँ न जाने किस शायर का है ; 

" दिल में हर लहज़ा है सिर्फ़ एक ख़याल

तुझ से किस दर्जा मोहब्बत है मुझे" 

शायद मीराजी की किसी ग़ज़ल का शेर है ऐसा मखमली लहज़ा उन्हीं का है या राम जाने, मैं भूलता भी तो बहुत हूँ। 

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अरसे बाद आज अख़बार खोला था, खोलते ही अपने फ़ैसले पर ख़ुशी हुई कि अच्छा हुआ जो नहीं पढ़ता हूँ। सूचनाओं ने आदमी को सबसे ज्यादा फ़्रस्टेट किया है। ख़ैर यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि कौन सी सूचना काम की है और कौन सी नहीं मगर इससे इंकार नहीं किया जा सकता की इस दौर का सबसे बड़ा हथियार है सूचना.. जिसके पास जितनी ज्यादा सूचना है वह किसी और के लिए उतना ही खतरनाक और भयावह है। 

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किसी को किसी ने संसद में धक्का दे दिया, किसी ने डॉ अंबेडकर पर जो मन आया बोल दिया, कभी कभी मैं इस बात पर देर तक सोचता रहता हूँ की लोग अपना दिमाग क्यूँ अपनी जबान से इतना दूर रखते हैं। जब उनको पता है की वह बोलते हुए दिमाग नहीं लगा पाते तो उन्हें सावधान रहना चाहिए। इस देश को एक दिन इसके अलग अलग दलों के नेता मिलकर ले डुबेगें। ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं, वह भगवे में हों, नीले में, पीले में हों या हरे में । पंजे को पांचों उंगलियों ने जकड़ लिया है.. इस जकड़ में किसी को आज़ादी दिखती है किसी को कसाव। सबने अपनी अपनी सोच की दीवार बना रखी है और कोई भी उस दीवार के पार देखना ही नहीं चाहते। निष्पक्ष जैसा कुछ बचा नहीं है। हर कोई किसी न किसी के पक्ष में है। मनुष्यता वेंटिलेटर पर पड़ी है। 

इन दिनों गड़े मुर्दे उखड़ रहे हैं, यह अभी तब तक उखड़ेंगे जब तक इनका अगला मंतव्य पूरा न हो जाएगा। 

वर्तमान में सभी नेताओं को पदहस्त कर देना चाहिए। देश की मूल भावना अनुरूप कोई नहीं हैं। 

ख़ैर! यह होने से रहा, और मैं ऐसे जाहिलों के लिए एक शब्द, एक पन्ना भी ख़र्चने से रहा। 

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आज तीसरी रात है नींद आ जाए तो नींद का शुक्रिया अदा करूँगा। चोट कितनी अजीब घटना है जीवन में बिजली की तरह आती है और सब बदल कर उड़ जाती है, देह की नस नस दुख रही है। ठण्ड बढ़ी है पर अभी कुहरा नहीं हो रहा, खेती बाड़ी ठीक है, कल तक सब निपट जाएगा। खेती आदमी माँगती है और आदमी बस अनाज चाहता है। उसे मिट्टी से इंफेक्शन होता है। मिट्टी को इंफेक्शन देने वाला आदमी ही अब मिट्टी को कोसता फिरता है। 

और सब ठीक है। 

20 दिसम्बर 2024 / शाम 9 बजे

― आशुतोष प्रसिद्ध

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