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दिन-दारी


बोलते बोलते लगता है इस बोलने का कोई अर्थ नहीं और चुप हो जाता हूँ। चुप हो जाता हूँ तो बिना मुँह खोले मन ही मन बोलता रहता हूँ, मन को भी कहता रहता हूँ पर मन सुनता ही नहीं। 

क्या कोई जानता है की ये मन किसकी बात मानता है ? मैं उससे बात करना चाहता हूँ। 

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दिन सूर्य के दिखने से पहले हो जाता है और फिर पाँव तब तक चलते रहते हैं जब तक आँख को रौशनी से देखने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। वही सब खेती बाड़ी घर गृहस्थी नाते रिश्तदारी जिसकी कोई गिनती नहीं होनी है। मगर करना सब है। करना क्यूँ है का जवाब बस इतना भर है कि इससे परिवार की भावना जुड़ी है। जीवन का सारा सार भावना से ही तो है। कितनी गैर जरूरी बातें भी जरूरी लगने लगती हैं जब किसी चीज़ या किसी व्यक्ति से भावना जुड़ जाए, फिर आपके लिए वही जरूरी हो जाता है, अन्यथा जीवन का सब गैरजरूरी ही है। इसी गैरजरूरी और जरूरी के बीच जीवन पेंडुलम की तरह झूलता ख़त्म हो जाता है और आदमी न इधर का होता है न उधर का 

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1 साल 1 महीने 17 दिन बाद भीतर ग़ज़ल की सी धुन तारी हुई है, एक शेर हुआ भी है, आख़िरी बार ग़ज़ल स्टेशन पर बैठकर कही थी उसमें शब्द और आँसू का साम्य था, मैं जान ही नहीं पाया कि मैं गद्य लिख रहा हूँ कि ग़ज़ल कह रहा हूँ, अभी इस धुन में वह रवानी नहीं आ पायी है, जाने कब यह उतरेगी। मुझे अपने आप को पढ़कर देखना है कि मुझे अभी अपने को और कितना गलाना है।  

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आज शाम स्टेशन पर गया था.. इस स्टेशन से कोई याद तो नहीं.. मगर जिस स्टेशन की याद है उस स्टेशन को याद करने के लिए वहाँ गया था, बैठा रहा कुछ घड़ी.. स्टेशन मुझे भय से भर देता है, वह मुझसे मेरा घर दूर लिए जाता है। ख़ैर..

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संतोष, संतोष, संतोष... मगर कब तक.. क्या जीवन के सारे दिन इस झूठे शब्द के कड़वे स्वाद के साथ बीतेगा।

मुझे ' सब ठीक है' और 'सब ठीक हो जाएगा' इन दो वाक्यों से वैसे ही डर लगता है जैसे छोटे बच्चों को भूत से लगता है। यह बड़े छली वाक्य हैं। 

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I am fed up with this life. So many compromises, so many beatings, so many insults, such a discriminatory society, where one man treats the other man like an insect, here two people in love don't even get a place to stand. Wearing a cheap khaki uniform, the police here abuses the common man. The leaders who take votes from the people to sit on the chair don't even let them sit on the ground..what is the meaning of such a society and life in such a society where we are living like servants and slaves. Fighting and screaming are not in our control.. it is better that we don't live..


– आशुतोष प्रसिद्ध

22 दिसम्बर 2024 / 8:10 

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