जो जीता हूँ लिख देता हूँ। लिख देने के बाद मन ही मन सोचता हूँ शायद अब यह न जीना पड़े, मगर फिर फिर उस लिखे हुए को जीना पड़ता है, 6 वर्ष पहले आख़िरी बार जब कहानी मन के गर्भ से कागज़ पर उतरी तो लगा था कुछ अच्छा कर ले गया, पर लिखने के कुछ दिन बाद वह सामने घटित हो गई तो भीतर एक डर बैठ गया, अब भीतर पटकथा बननी शुरू होती है तुरंत उसे मार देता हूँ, कभी कभी जब अपने को देख रहा होता हूँ तो लगता है मैंने कितने भ्रूणों की हत्या कर दी, मैं उन्हें बचा सकता था। यह तो वही गवईं ढकोसला हुआ न कि इस साल होली पर हमारे घर किसी का देहांत हो गया तो आने वाले किसी साल हम होली न मनाए, जीवन रोक देना कहाँ तक उचित है ? मगर फिर वही करता हूं क्यूँ ? पता नहीं। कभी कभी यह उचित भी लगता है। जब मन भावुक होता है तो समझदारी भरी बातों से कोफ़्त होती है। इतने दिनों से जो यह लगातार पन्ने रंग रहा हूँ इसका हासिल क्या है पता नहीं, यह सब कुछ कचरा है, अवशिष्ट निकल जाने के बाद ही कुछ काम का बचता है, देखते हैं कब तक यह अवशिष्ट ख़त्म होता है।
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दिन बीत ही नहीं रहा है जैसे, कुछ भी करता हूँ मन में बस समय चल रहा है, मगर यह समय है की बीतने का नाम ही नहीं ले रहा है, यह 26 आने के कितने दिन लग गए, प्रतीक्षा बड़ी कठिन परीक्षा लेती है। कल की सुबह शायद सुंदर होगी.. अपनी लिखी एक कविता दिन भर जहन में नाचती रही, करता भी वही रहा। प्रतीक्षा में आदमी करे भी क्या प्रतीक्षा करने के अलावा...
/ घड़ी के भीतर
घूमती सुइयों से ज्यादा
घड़ी की तरफ़
घूमता हूँ मैं
घूमते हुए महसूसता हूँ
धीमी चल रही है दीवार घड़ी
मेरे मन की घड़ी से
/ कवितांश
ये कविता जून में हुई थी, इसे मैं लौट लौट कर जीता हूँ।
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आज एक पुराने मित्र से बात हो रही थी, बात के दरमियान उन्होंने कहा यार मुझे स्कूल के दिन बड़े याद आते हैं अब तो जीवन इतना मशीनी हो गया कि समय ही नहीं मिलता अपने लिए, पहले कितना सुख था, उन दिनों की स्मृति बड़ी सुंदर है, मैं नहीं कह पाया, मुझे पुराने यानि स्कूल के दिनों की कोई याद नहीं आती, जीवन आज जैसा है तब भी वैसा ही था, न तो तब्य मुझे स्कूल में कोई पसंद था की उसकी याद आए, तब आर्थिक चिंता नहीं थी बस, खेत , खलिहान, परिवार समाज, यही सब मैं तब भी कर रहा था वही अब भी कर रहा हूँ, तब भी आँसू अकेले ही पोंछता था अब भी, तब भी मन डायरी से ही कहता था, तब भी नींद नहीं आती थी अब भी..तब के जीवन से अब का जीवन कुछ ठीक है, मगर साथी कोई नहीं है..जिसके साथ मैं होना चाहता हूँ वह समय के हाथों मजबूर है।
रात करवट बदलते बीत जाती है। योजना बनाता हूँ बिगड़ जाती है। पिता बूढ़े होते जा रहा हैं, यह बात जब जब दिमाग में कौंधती है आत्मा काँप जाती है। मगर ठीक है जीवन .....
देखो फिर वही दिलासा ... हमारे पास अपने मन को और अपनों को देने को बस दिलासा ही है।
हमारे बुजुर्ग मीर तक़ी मीर साहब तो कह ही गए हैं वही कहना है शायद जिससे लिए इतने शब्द बर्बाद किया, वही कहता हूँ...
" अब देख ले कि सीना भी ताज़ा हुआ है चाक
फिर हम से अपना हाल दिखाया न जाएगा "
― आशुतोष प्रसिद्ध
25 दिसम्बर 2024 शाम 7 बजे
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