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इच्छाओं का समुच्चय


ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ? 

मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिससे मैं संतुष्ट हो सकूँ। क्या असन्तुष्टि मेरी नियति है ? क्या मैं अपनी इच्छाओं के लिए हमेशा कागज़ कलम और कल्पना के ही पास जाऊँगा ? फिर ऐसे जीवन का क्या अर्थ जिसमें हमें बस समझौते ही करके जीना हो ? शायद कुछ होता हो जो मुझे नहीं दिखता। 


जीवन विसंगतियों के समुच्चय की तरह खड़ा है अजीब यह है कि मुझे गणित का ये अध्याय कभी समझ नहीं आया। इसके लिए मैंने कुछ दिन कोचिंग भी ली मगर जब ये सवाल लगाए जाते तो लगता न जाने क्या बोला जा रहा है, मेरे कानों में अलग अलग तरह की ध्वनि तरंगे गूँजती जिनमें नए किस्म की लय होती थी, जिन्हें मैं कागज पर लिखता और बाद में देखता तो वो कविता होती थी। मैं हमेशा डरता रहता था कि मेरे गणित के अध्यापक मेरी कॉपी के पन्ने न पलट लें। मुझे पता था मेरी कविताओं की भावुकता गणित के मास्टर के क्रोध को नम नहीं कर पाएंगी। 

यह सब उन दिनों की बात है जब मैं बहुत सी चीजों इच्छाओं और अपनी देह में होते बदलावों को टीवी चैनलों के प्रचार और कुछ उज्जड लड़कों के फोन में जबरन दिखाए जाने पर जान रहा था। मैं इतना सिमटा रहता था कि मेरे बचपन से लेकर आजतक गिन के चार दोस्त भी नहीं बने थे। जबकि मेरी 10वीं की कक्षा में 200 से ज्यादा हमउम्र थे। मुझे मेरे सब हमउम्र पागल लगते थे, उन्हें मैं भी लगता रहा होऊंगा। उनके पास घूमा फिराकर बस कुछ  ही बातें होतीं थीं, उन दिनों टच स्क्रीन फोन बढ़ने शुरू हुए थे, मुझे तब तक फोन नहीं मिला था, इच्छा होती थी मिल जाए, जबकि पता नहीं था कि मिल जाएगा तो करूँगा क्या ? मेरा ज्यादातर समय अकेले इधर उधर खड़े रहने, ट्रेन देखते या पढ़ते या इण्टरवल में खिड़की पर बैठकर बाहर खेलते और बतियाते हमउम्र लोगों को देखना भर होता था, छुट्टी होते ही बस साइकिल जितनी तेज चल सकती चलाकर घर पहुँचना होता था चारा मशीन और लाल गाय हमारी साइकिल न आने तक ही चुप रहते थे, साइकिल की खट होती की वो खूंटे के चारों तरफ घूमने लगतीं, कभी कभी थकान में भयंकर चिढ़ होती तो अकेले बैठकर रो पड़ता कि अब ये मिट्टी हुआ गोबर उठाने में अलग नरक होगी। 

इन्हीं दिनों में ही धीरे धीरे जान पाया की जीवन में सुंदर क्या हो सकता है, कोई कहानी या उपन्यास मिल जाता तो रात में चुपके चुपके पढ़ता और हर उपन्यास के आदर्श पात्र की तरह रहने का सोचता, कैसे बोलना है, कैसे रहना है, परिवार को सबसे ऊपर रखना है, अपने लिए नहीं अपनों के लिए सोचना है, कोई घनी इच्छा भी हो तो अगर सामने वाले कि इच्छा नहीं है तो त्याग देना है, प्यार जब होगा तो कैसे रहना है। मेरे मस्तिष्क में ये बात मेरे बड़े होने के शुरुआती दिनों से था कि प्यार होगा मुझे.. उसके लिए इंतज़ार किया। हुआ। तब हुआ जब जिंदगी से ऊब चुका था यूँ लगता था कि बस अब और नहीं.. जैसे तपते रेगिस्तान में एक घना हरा पेड़ मिल जाए, उस पेड़ को देखकर मेरे भीतर दबी तमाम इच्छाएँ वैसे ही कुलबुला कर  फूट पड़ीं जैसे बरसात के बाद मिट्टी के नीचे दबे बीज फुट पड़ते हैं। कभी कभी लगता कि मैं उस छाया पर हावी हो रहा हूँ, कभी कभी डर लगता तो अकेले में सुबक पड़ता। 

हम जिस पेड़ की छाँव में ठहर गए हैं उस पेड़ को हमारी संगत कैसी लग रही है यह तो उसे बोलना पड़ेगा न, या जाने लगो तो रोकना तो चाहिए ? यह कैसे जाना जा सकता है कि सामने वाले में भी इच्छाओं की तीव्रता उतनी ही जितनी मुझमें है। बड़ी मुश्किल है ये।  ऐसी स्थिति में छाँव भी छाँव की तरह नहीं लगती। अपनी इच्छाओं पर ग्लानि होती है। और ग्लानि तो होती ही है हमें गलाने के लिए। 


लोग कहते हैं इच्छाओं पर काबू जरूरी है, लेकिन काबू तो उन चीजों पर पाया जाता है न जो बेकाबू हों जो जन्मते ही मर जाते हों उनपर क्या..हम तो इच्छाओं के लिए उस घाट की तरह हैं जहाँ दाह संस्कार होता है। हमें उनका जीवन देखने का सुख नहीं मिलता सिर्फ उनके मृत होने पर उन्हें यहाँ से मुक्त होने भर की जगह देने का सुख मिलता है। हां सुख ही.. 

इन दिनों मैं पढ़ नहीं पा रहा था कुछ, पढ़ने बैठता तो मन लगता ही नहीं तो कुछ हल्का पढ़ने का प्रयास किया, दो कविता संग्रह पढ़े, एक संस्मरण पढ़ा, सुबह उठता हूँ तो एक घण्टे उपनिषद और श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने का प्रयास करता हूँ, दो चार श्लोक तो पढ़ ही लेता हूँ। 


कल सुबह एक श्लोक पढ़ा। फिर 10 या 11 बजे रात के आसपास उसे दुबारा पढ़ा। अभी डायरी उठाने से पहले फिर पढ़ा वह बार मुझे अलग अलग समझ आ रहा है। 

यह प्रश्नोपनिषद का एक भाग था, प्रश्नोपनिषद में कुल 6 प्रश्न हैं, जिसे भारद्वाज ऋषि के पुत्र सुकेशा और उनके साथ के कुछ अन्य ऋषियों ने पिप्पलाद ऋषि से पूछा है। 

इनके प्रश्न बड़े रोचक हैं और उनका उत्तर उससे भी रोचक। इन 6 प्रश्नों में मनुष्य की उत्पत्ति, उनके देवता, प्राण की उत्पत्ति, पुरुषों में सोलह कला क्या है, और अलग अलग लोकों की प्राप्ति के उपाय पूछे गए हैं। 

ग्रंथों की तरफ लौटने पर भीतर अजीब सा बदलता हुआ और सुखद सा कुछ महसूस होता है, हमारे पास ज्ञान और अनुभव की इतनी विशाल लिखत है ,लेकिन हम उन्हें ध्यान में ही नहीं लाते। मैं भी नहीं लाता। या शायद स्वार्थ वश पढ़ता हूँ कि कुछ दबा छिपा जान पाउँ, इच्छाओं और बेचैनीयों की उपज का बीज खोज जाऊँ संभव है मरते तक मिल जाए। फिर सवाल यह भी है जिसे मिल गया होगा वह बीज वो क्या मरा भी होगा, देह अंत तो हुआ ही होगा, क्या वह मरा होगा ? मनुष्य भी तो किसी की इच्छा ही है..?

ख़ैर ! यहां से बात अलग और लम्बी खिंच सकती है। छोड़ते हैं। 


― 28 मई 2025 / सुबह 11 बजे 

टिप्पणियाँ

  1. अपनी इच्छाओं को वैसे का वैसे लिखना बहुत कम लोगों के द्वारा ही लिखा जाता है... बेहतरीन 🌼🌼

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