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बीते दिन की बात

बीते हुए दिनों को बीते हुए दिनों की तरह याद करता हूँ और सोचता हूँ क्या बीतते दिनों के साथ भी ऐसे ही याद कर पाउँगा बीते दिनों को.. देख पाऊँगा की पिछले, उसके पिछले और उसके पिछले साल क्या क्या कहा और किया था आज के दिन। अगर मिटाए और डिलीट न किए जाए तो अब किसी की जीवनी लिखना पहले से ज्यादा आसान काम है। चैट उसकी डायरी है जहाँ वो निर्वस्त्र भी है और सजा धजा भी, वहीं उसकी पनीली आँख भी है और गर्व से चमकदार भी, वो वहीं किसी से रोया गिड़गिड़ाया है, किसी को धमकाया भी है। 

लगभग बीत चुके की याद बीत चुके की तरह नहीं ग्लानि की तरह आती है। 

आज का दिन भी किसी दिन के लिए बीता हुआ दिन हो गया। ऊबते ऊँघते और पसीना पोछते बीता दिन। कुछ रचनात्कम नहीं, कुछ विशेष नहीं, बस बीत गया। भीतर कोई इंतज़ार चलता रहा और ख़ुद से ही सवाल करते जवाब देते समझते समझाते बीत गया। बीत जाना ही था। 

ढ़ेर सारी किताबें देख रखी थीं इकट्ठा कर रखी थी ये ले लूँगा पर सब... अब जो कुछ कहीं से जुड़ता जुहाता है, घर में या घर के लिए हो जाता है। एक चश्मा बनवाना है जो जनवरी में हुए एक्सीडेंट में टूट गया था, तबसे यूँ ही टालते हुए टल रहा है, मैं आँख की क्षमता जाँच रहा हूँ। शायद .. मगर लग रहा है बनवाना पड़ेगा। 

कवि राम कुमार तिवारी का एक कविता संग्रह पढ़ा, 'कोई मेरी फ़ोटो ले रहा है' ऐसी कविता और ऐसी दृष्टि नहीं देखी थी अब तक, अगर देखी थी तो विनोद कुमार शुक्ल के यहाँ, ये कविताएँ उसके समकक्ष बैठती कविताएँ थी। ऐसे संग्रह मिलें तो कितना आनंद आए। 

मैं धीरे धीरे एक घटाटोप की तरह होता जा रहा हूँ, वह हो गया जो कभी नहीं होना चाहता था, एकदम चुप्प, सँकोची, हरदम डरा हुआ सा.. कभी कभी लगता है मैं लता हूँ मुझे सहारा चाहिए खड़े होने के लिए, जब तक मेरे आसपास कोई पूस करने वाला नहीं होता, मुझसे वो सब कुछ नहीं होता जो मैं कर लेता था सहजता से।

देर तक या सामान्य भी मैं संवाद ही नहीं कर पाता कोई बैठता है मेरे पास तो कुछ क्षण बाद ही वह ऊबने लगता है, मैं बाहर की तरफ से इतना चुप हो गया हूँ अब मेरी सब आवाज़ भीतर ही रह जाती है..

मैं बोलना चाहता हूं, दौड़ना खेलना चाहता हूँ, मैं घूमना चाहता हूँ, मैं लड़का बना रहना चाहता हूं .. पर हर दो बात के बाद मैं बाप या भाई या जिम्मेदार बनकर चुप हो जाता हूँ।

― 12 मई 2025 / 10 : 20 रात 

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