निर्वासन सा महसूस होता रहता है। कहाँ से ? यह पता नहीं। मगर लगता है कहीं हूँ ही नहीं। जिस परिवार के लिए जूझता रहा, अपने को खपा दिया, वहीं मुझसे कोई बातचीत ही नहीं है। सूचनाएं दुसरो से मिलती हैं। लगभग रोज फोन करूँ तो बात हो न करूं तो पलट के कोई पूछता तक नहीं। मैं देर तक निहारता रहता हूँ राह, कोई पुकारे , कोई कभी तो कहे कि .... ख़ैर.. यह स्वीकार करना कितना कष्टकारी है कि धीरे धीरे अपने भाई बहन भी पड़ोसी बन जाते हैं। अनन्तः आपका कौन है आपकी माँ और बीबी के सिवा.. ? वो भी एक दिन नहीं पूछें तो कोई अचरज नहीं होगा। मेरे भीतर कल्पनाओं का एक संसार है, जहाँ मैं अपनी रचनात्मक उठापटक के साथ रहता हूँ। मुझमें घनघोर कामना है। वासना नहीं है। है भी तो वह उसी की है जिसके लिए होनी चाहिए। मैं घण्टों चुप रहता हूँ, कम बोलता हूं , बाहर लोगों से इंटरैक्ट नहीं हो पाता इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मैं आ अकेले रहना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि कोई है को महसूता रहूँ और रहूँ। मैं रहने की तरह रहना चाहता हूँ। अतिक्रमण की तरह नहीं। मैं जीने की तरह जीना चाहता हूँ मरते रहने की तरह नहीं। * ...