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अजब साज़िशें हैं कहाँ आ गया हूँ

जो जीता हूँ लिख देता हूँ। लिख देने के बाद मन ही मन सोचता हूँ शायद अब यह न जीना पड़े, मगर फिर फिर उस लिखे हुए को जीना पड़ता है, 6 वर्ष पहले आख़िरी बार जब कहानी मन के गर्भ से कागज़ पर उतरी तो लगा था कुछ अच्छा कर ले गया, पर लिखने के कुछ दिन बाद वह सामने घटित हो गई तो भीतर एक डर बैठ गया, अब भीतर पटकथा बननी शुरू होती है तुरंत उसे मार देता हूँ, कभी कभी जब अपने को देख रहा होता हूँ तो लगता है मैंने कितने भ्रूणों की हत्या कर दी, मैं उन्हें बचा सकता था। यह तो वही गवईं ढकोसला हुआ न कि इस साल होली पर हमारे घर किसी का देहांत हो गया तो आने वाले किसी साल हम होली न मनाए, जीवन रोक देना कहाँ तक उचित है ? मगर फिर वही करता हूं क्यूँ ? पता नहीं। कभी कभी यह उचित भी लगता है। जब मन भावुक होता है तो समझदारी भरी बातों से कोफ़्त होती है। इतने दिनों से जो यह लगातार पन्ने रंग रहा हूँ इसका हासिल क्या है पता नहीं, यह सब कुछ कचरा है, अवशिष्ट निकल जाने के बाद ही कुछ काम का बचता है, देखते हैं कब तक यह अवशिष्ट ख़त्म होता है।  ********* दिन बीत ही नहीं रहा है जैसे, कुछ भी करता हूँ मन में बस समय चल रहा है, मगर यह समय है की ...